आत्मसम्मान पर कविता
नारी जीवन और संवेदनालखनऊ में जो ओला ड्राइवर और एक लड़की की झड़प
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लखनऊ में जो ओला ड्राइवर और एक लड़की की झड़प
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मैंने अपनी स्वरचित कविता “विधवाएं” कुछ समय पहले ही लिखी है ,और इसे लिखने के लिए प्रेरणा भी मुझे यथार्थ ही मिली। कि हम चाहे कितनी ही तरक्की क्यूं न कर ले मगर हमारी सोच औरतों को लेकर अब भी संकीर्ण ही है।
जब नायक नायिका से बेइन्तहां सच्ची मोहब्बत करता है उनसे मिलने का वक्त आता है तो नायिका के तरफ से कुछ विरोधी खड़े हुए तब अन्त मे नायक इस कविता के द्वारा उनके सामने खुले रुप मे आगाज करता है –
उनसे मेरा प्यार महादेव की निशानी है Read More »
कविता बहार के मंच पर प्रसारित प्रतियोगिता में प्रतिभागिता हेतु “गुलाब” विषय पर कविताएं आमंत्रित थीं। मैं अपनी कविता इस संदर्भ में अग्रसारित कर रहा हूं। इसका शीर्षक है -“गुलाब नहीं है पुष्प आज”। इसमें गुलाब के विभिन्न स्वरूपों का वर्णन है – ये प्रेम का प्रतीक है, मेहनत का प्रतीक है, दोस्ती का प्रतीक है, कोमलता का प्रतीक है….। इन सब की ओर इशारा करती मेरी कविता निर्धारित तिथि 23 सितंबर 2021 से पूर्व प्रेषित है। आशा है संज्ञान लिया जाएगा। धन्यवाद।
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गुलाब की अभिलाषा का वर्णन कविता के माध्यम से किया गया है।
गुलाब की अभिलाषा – अकिल खान Read More »
शिक्षक का गुणगान कविता के माध्यम से किया गया है।
शिक्षक का ज्ञान – अकिल खान Read More »
मनुष्य रचना के आधार से मानवीय जीवन मूल्य तथा दो मनुष्यों के बीच मनुष्यता का बोध उठाने का विचार मनुष्य शीर्षक द्वारा प्रकट करना चाहती हूं।
नारियल एक बहुवर्षी एवं एकबीजपत्री पौधा है। इसका तना लम्बा तथा शाखा रहित होता है। मुख्य तने के ऊपरी सिरे पर लम्बी पत्तियों का मुकुट होता है। ये वृक्ष समुद्र के किनारे या नमकीन जगह पर पाये जाते हैं। इसके फल हिन्दु | हिन्दुओं के धार्मिक अनुष्ठानों में प्रयुक्त होता है। बांग्ला में इसे नारिकेल
मेरा भारत देश महान (16-15 मापनी नवगीत) पाटी पर खड़िया से लिख दूँमेरा भारत देश महान।पढ़ लिख कर मैं कवि बन गाऊँभारत माता के गुणगान।। बाबा चिन्ता मत कर मेरीलौटेंगे बीते दिन रीतदिनकर बनकर गीत लिखूँगाछंद लिखूँगा माँ की प्रीत गाएँगे सब शाम सवेरेऐसी लिखूँ तिरंगा तान।पाटी……………….,..।। पोथी कलम दिलाना मुझकोकुछ ही दिन बस सहने
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मन पर कविता (१६,१६) मानव तन में मन होता है,जागृत मन चेतन होता है,अर्द्धचेतना मन सपनों मे,शेष बचे अवचेतन जाने,मन की गति मन ही पहचाने। मन के भिन्न भिन्न भागों में,इड़, ईगो अरु सुपर इगो में।मन मस्तिष्क प्रकार्य होता,मन ही भटके मन की माने,मन की गति मन ही पहचाने। मन करता मन की ही बातें,जागत
दर्द न जाने कोय….. बाल भिक्षु पर कविता(विधाता छंद मुक्तक) झुकी पलकें निहारें ये,रुपैये को प्रदाता को।जुबानें बन्द दोनो की,करें यों याद माता को। अनाथों ने, भिखारी नें,तुम्हारा क्या बिगाड़ा है,दया आती नहीं देखो,निठुर देवों विधाता को। बना लाचार जीवन को,अकेला छोड़ कर इनको।गये माँ बाप जाने क्यों,गरीबी खा गई जिनको। सुने अब कौन जो
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