KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

चटक लाल रोली कपाल

इसे कविता में प्रातः कालीन छंटा का मानवीकरण है।

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चटक लाल रोली कपाल

चटक लाल रोली कपाल,

मस्तक पर अक्षत लगा हुआ,

मुखमंडल पर आभा ऐसी,

दिनकर जैसे नभ सजा हुआ |

ये अरुणोदय का है प्रकाश,

या युवा ह्रदय की प्रबल आस,

सुर्ख सुशोभित मस्तक पर,

प्रस्फुटित हुआ जैसे उजास |

अक्षत रमणीय छवि बिखेरे,

माणिक को ज्यो कुंदन घेरे,

लगा लाल के भाल दमकने,

चला प्रभात करन पग-फेरे |

विस्मयकारी छटा मनोहर,

अलौकिक हैं दिव्य रूप धर,

सुधा कलश से छलकी ऐसे,

तरल तरंगों में गुंजित स्वर |

उमा विश्वकर्मा, कानपुर, उत्तरप्रदेश

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