दौलत की भूख

दौलत की भूख

आया कैसा नया ज़माना
दौलत आज सभी को पाना
यह एक ऐसी भूख है
रिश्तों की बेल जाती सूख
किसी की परवाह न करे

इंसान झूठ बोलने में माहिर हुआ
कुत्सित काम है बात आम
लालच ने यूं अंधा किया
भ्रष्टाचार  अंदर तक पनपा
सारे नाते रिश्ते तोड़े 

बिना डरे क्षुधा फिर भी नहीं मिटती है।
पैसा  मात्र इक  गिनती  है
जोड़े जाओ जोड़े जाओ
गिनती नहीं थमती है
रिश्वत लेन देने में न डरे

पैदा तो खाली  हाथ हुआ
भोलापन हृदय का गुम हुआ
फिर  भूला  सारी  सच्चाई
अंधाधुंध करे अब कमाई
पैसे के लिए कत्ल से भी न डरे

धन  के  पीछे  भागता मानव
मूल्य सारे त्याद बना दानव
अमिट भूख ने बदला कैसा
उसके चश्मे का रंग भी पैसा
रोज चश्मे बदलने में न डरे

मूल्य गए भाड़ में
खुशियां चढ़ीं झाड़ पे
कृत्रिम खुशी ही सबकुछ बनी
पैसे के कारण सबसे ठनी
लूट सकता अब वह बिना डरे

*प्रवीण त्रिपाठी, नई दिल्ली*

Please follow and like us:

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You cannot copy content of this page