KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

फागुन बहार है

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फागुन बहार है

मनहरण घनाक्षरी(8,8,8,7)


शीत है न अब घाम ,
सुखद है सब याम ,
वन -उपवन नव-
पल्लव निखार है।

बाज रहे हैं नगारे,
होरी के हैं हुमकारे,
लरिकन में देखो तो
उमंग अपार है।

सरसों फूली मस्तानी
अमलतास दीवानी ,
सेमल बेला है रानी
टेसू तो अंगार है।

चले हवा मंद-मंद
महुवे की ले सुगंध
अलि पी के मकरंद
करता गुंजार है ।

सेमल है लाल-लाल
नीले नभ में गुलाल
पीली सरसों का जाल –
धरा में विस्तार है।

कूक रही काली-काली
कोयलिया मतवाली
पी-कहाँ,पी-कहाँ कह
करती पुकार है।

बौर आयी अमराई,
छाय रही घनघाई,
झूम कहे डाली देखो
फागुन बहार है।


सुश्री गीता उपाध्याय
प्र. पा. रामभांठा
रायगढ़(छ.ग.)

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