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गांधी जी के विचार – जगदीश कौर प्रयागराज

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गांधी जी के विचार – जगदीश कौर प्रयागराज



गांधी तेरे विचारों की फिर जरूरत है ।
सत्य, अंहिसा, रामराज्य की हसरत है।

मानव को मानव का दर्जा मिल जाए ।
मंहगाई में सबका खर्चा चल जाए।
इंसानियत न बिके सरेआम बाजारों में ।
पढा लिखा वर्ग न खडा हो हजारों में।
अब फिर से अंहिसा का दे आ पाठ पढ़ा ।
गांधी बदले परिवेश में फिर जन्म ले आ।।

इंसान की जिंदगी बहुत सस्ती हो गई ।
देश की हालत बहुत खस्ती हो गई।
रामराज्य का सपना तेरा धूमिल हो गया ।
रावण राज्य का राह सरल हो गया।
आ एक बार फिर रामराज्य का पाठ पढ़ा।
गांधी बदले परिवेष में फिर जन्म ले आ ।।

नैतिकता का हास आज चरर्मोत्कर्ष पर है।
पेट भरने वाला अन्नदाता आंदोलन पर है ।
रसोई गैस की कीमत आसमान छू रही ।
देश की जनता गहरी निद्रा में सो रही ।
फिर आ के सब को जागरूकता का पाठ पढ़ा।
गांधी बदले परिवेष में फिर जन्म ले आ ।।

आक्सीजन की मार से जनता त्रस्त है ।
हस्तपतालों में सुविधाएं की हालत पस्त है।
स्वाधीनता की भावना दम तोड़ रही ।
धरती बच्चों की लाशों का बोझ ढ़ो रही ।
एक बार फिर इश्क का चरखा आके चला।
गांधी बदले परिवेश में फिर जन्म ले आ ।।

पावन नीर भी लाल लाल हो गया।
देख तेरे सुंदर भारत का क्या हाल हो गया ।
हरियाली कहानियों में सिमट कर रह गई।
प्रकृति भी अपने दोहन की मार सह गई।
आ के फिर से इस गुलशन को गुलजार कर जा।
गांधी बदले परिवेश में फिर जन्म ले आ ।।

सत्ता की लोलुपता ने जमीर मार दी ।
सोने की चिडिय़ा धर्म ,जाँत में बाँट दी।
कलियों की इज्जत पैरों तले रोंद दी ।
भावी पीढी पूंजीपतियों ने नशे में झोंक दी।
भारत को नफरत की आग से झुलसने से बचा ।
गांधी बदले परिवेश में फिर जन्म ले आ ।।

जगदीश कौर प्रयागराज
मौलिक स्वरचित
प्रयागराज इलाहाबाद यूपी

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