गीत माला

. ? *गीतमाला* ?
© सर्वाधिकार सुरक्षित ®
बाबू लाल शर्मा बौहरा *विज्ञ*
सिकंदरा,दौसा, राजस्थान (भारत)
के ४२ छंदाधारित चुनिंदा *गीत/नवगीत* का अनूठा संग्रह
१””””””””””””””””बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
. *प्रेम/प्यार करूँ*
. ??
मन में शुभ भाव उमड़ते हों,
तब मैं भी चाहूँ,प्यार करूँ।

जब रिमझिम वर्षा आती हों,
ज्यों गीता ज्ञान सुनाती हो।
खिड़की से तान मिलाती हो,
मुझको मानो उकसाती हो।
श्वेद संग वर्षा में गाऊं,
मै,भी जब कुछ श्रम साध्य करूं।
मात का उज्जवल भाल सजे,
तब मैं भी चाहूँ प्यार करूँ।।

भाती है दिल आलिंगन सी,
स्वर सरगम हिय के बंधन सी।
मन मे शुभ भाव सँवरते हो,
जब नेह दुलारे रिश्तें हों।
क्यूँ ना चल कर पतवार बनूं,
बिटिया को शिक्षादान करूं,
कुछ अपने पन की बातो से,
तब मै भी चाहूँ प्यार करूँ,

जन की सेवा हरि की सेवा,
हरि जन सेवा काज सभी।
मैं मेटूँ कुछ पीर पराई,
हो मनुज,मनुज स्वीकार सभी।
लोकतंत्र के जन गण मन को,
मन नमित नमन हर बार करूँ।
जब राम राज्य सा शासन हो,
तब मैं भी चाहूँ प्यार करूँ।

*कुछ आकुल अधर बुलाते हों,*
*तन मन संत्रास जगाते हों।*
*कड़वे आकर्षक आमंत्रण,*
*इस दिल से तान मिलाते हों।*
*अपना भारत,वतन तिरंगा,*
*इतिहासी,संस्कृति गान करूँ*
*संविधान ,संसद गौरव हो,*
*तब मैं भी चाहूँ प्यार करूं।*
. ??
✍©
बाबू लाल शर्मा, बौहरा,सिकंदरा,
दौसा(राज.)9782924479
?????
२””””””””””””””””””””””””””” *विज्ञ*
. *गीत*
. (लावणी छंद में)

कोयल जैसी बोली वाले,
मुझको गीत सिखा देना।

शब्द शब्द को कैसे ढूँढू,
कैसे भाव सँजोने हैं।
कैसे बोल अंतरा रखना,
मुखड़े सभी सलोने हैं।
शब्द मात्रिका भाव तान लय,
आशय मीत सिखा देना।
कोयल जैसी बोली वाले,
मुझको गीत सिखा देना।

मन के भाव मलीन रहे तब,
किसे छंद में रस आए।
राग बिगड़ते देश धर्म पथ,
कहाँ गीत में लय भाए।
रीत प्रीत के सरवर रीते,
शेष प्रतीत सिखा देना।
कोयल जैसी बोली वाले,
मुझको गीत सिखा देना।

व्याकरणी पैमाने उलझे,
ज्ञानी अधजल गगरी के।
रिश्तों के रखवाले बिकते,
माया में इस नगरी के।
रोक सके जो इन सौदौं को,
ऐसी प्रीत सिखा देना।
कोयल जैसी बोली वाले,
मुझको गीत सिखा देना।

गीत गजल के श्रोता अब तो,
शीशपटल के कायल हैं।
दोहा छंद गजल चौपाई,
कवि कलमों से घायल हैं।
मिले चाहने वाले जिसको,
ऐसी रीत सिखा देना।
कोयल जैसी बोली वाले,
मुझको गीत सिखा देना।।
. ???
✍”©
बाबू लाल शर्मा, बौहरा
सिकंदरा,303326
दौसा,राजस्थान,9782924479
??????
३”””””””””””‘बाबूलालशर्मा. *विज्ञ*
…. *गीत*
. °°°°°°
अब के सब कर्जे भर दूंगा,
बिटिया की शादी कर दूंगा।।

खेत बीज कर करी जुताई,
अबकी होगी बहुत कमाई।
शहर भेजना, सुत को पढ़ने।
भावि जीवन उसका गढ़ने।
गिरवी घर भी छुड़वा लूंगा,
बिटिया की शादी कर दूंगा।।

फसल बिकेगी,चारा होगा,
दुख हमने ही सारा भोगा।
अब वे संकट नहीं रहेंगे,
सहा खूब, अब नहीं सहेंगे।
इक भैंस दुधारू ला दूंगा,
बिटिया की शादी कर दूंगा।।

पका, बाजरा खूब बिकेगा,
छाछ मिलेगी, दूध बिकेगा।
घर खर्चो में रख तंगाई ।
घर वर देखूँ, करूँ सगाई।
इक कमरा भी बनवा लूंगा,
बिटिया की शादी कर दूंगा।।

आस दीवाली मौज मनाऊं,
सबको ही कपड़े दिलवाऊं।
फसल पके जो खूब निरोगी।
मौसम आए नहीं कुयोगी।
गृहिणी को झुमके ला दूंगा,
बिटिया की शादी कर दूंगा।।
. °°°°°°°°
✍✍©
बाबू लाल शर्मा”बौहरा”
सिकन्दरा,दौसा,राज.
??????
“४””””””””””””””””””””””””””” *विज्ञ*
. *गीत*
. °°°°°
*पास बैठो और सुनो बस*
*एक खनकता गीत मेरा।।*

जीवन समर बहुत है मुश्किल,
बाधाओं की हाट लगी है।
दुनिया रंग बिरंगी लेकिन,
होती देखी नहीं सगी है।
इसीलिए गाता अफसाने,
रूठ गया क्यों मीत मेरा।
एक खनकता गीत मेरा।।

मैं तो सच्चे मन का सेवक,
खूब समझता पीर पराई।
लेकिन दुनिया, दुनिया वाले,
सबने मेरी पीर बढ़ाई।
मैं भी भूलूँ इस दुनिया को,
तू भी सुन संगीत मेरा।
एक खनकता गीत मेरा।।

प्रीत करें तो नीति रीति से,
अपनेपन के भाव बिखेरे।
शाम सुनहरी, रात रुहानी,
खिले खिले हर रोज सवेरे।
इतनी ही बस चाहत थी यह,
जीवन जाता बीत मेरा।
एक खनकता गीत मेरा।।

पास बैठो और सुनो बस,
एक खनकता गीत मेरा….
एक खनकता……..।।
. °°°°°
✍©
बाबू लाल शर्मा, बौहरा
सिकंदरा, दौसा,राजस्थान
“५”????? *विज्ञ*
. *गीत/नवगीत*
. °°°°°
आ बैठे उस पगडण्डी पर,
जिनसे जीवन शुरू हुआ था।

बचपन गुरबत खेलकूद में,
उसके बाद पढ़े जमकर थे।
रोजगार पाकर हम मन में,
तब फूले ,यौवन मधुकर थे।
भार गृहस्थी ढोने लगते,
जब से संगिनी साथ हुआ था।
आ बैठे उस पगडण्डी पर
जिनसे जीवन शुरू हुआ था।

रिश्तों की तरुणाई हारी,
वेतन से खर्चे रोजाना।
बीबी बच्चों के चक्कर में,
मात पिता से बन अनजाना।
खिच खिच बाजी खस्ताहाली,
सूखा सावन शुरू हुआ था।
आ बैठे उस पगडण्डी पर,
जिनसे जीवन शुरू हुआ था।

बहिन बुआ के भात पेच भर,
हारे कुटुम कबीले संगत।
कब तक औरों के घर जीमेंं,
पड़ी लगानी मुझको पंगत।
कर्ज किए पर मिष्ठ खिलाएँ।
गुरबत जीवन शुरू हुआ था।
आ बैठे उस पगडण्डी पर,
जिनसे जीवन शुरू हुआ था।
. ??
✍©
बाबू लाल शर्मा, बौहरा
???????
६ ~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
. *गीत*
. °°°°°°°°
गुलमोहर है गुनगुुनाता,
अमलतासी सी गज़ल।

रीती रीती सी घटाएँ,
पवन की अठखेलियाँ।
झूमें डोलें पेड़ सारे,
बालियाँ अलबेलियाँ।
गीत गाते स्वेद नहाये,
काटते हम भी फसल।
गुलमोहर है गुनगुनाता,
अमलतासी सी गज़ल।

बीज अरमानों का बोया,
खाद डाली प्रीति की।
फसलें सींची स्वेद श्रम से,
कर गुड़ाई रीति की।
भान रहे हमको मिलेंगी,
लागतें भी क्या असल।
गुलमोहर है गुनगुनाता,
अमलतासी सी गज़ल।

भूलकर रंग तितलियों के,
मधुप की गुंजार भी।
चटखती कलियाँ मटकती,
भूल तन गुलजार भी।
सोचते यही रह गये हम,
भाग्य के खिलते कमल।
गुलमोहर है गुनगुनाता,
अमलतासी सी गज़ल।

घिरती आई फिर घटाएँ,
बरसती अनचाह में।
डूबे हम तैरी फसल सब,
दामिनी थी आह में।
बहते मन सपने सुनहले,
बस बचा पाया गरल।
गुलमोहर है गुनगुनाता,
अमलतासी सी गज़ल।
. ?‍♀?‍♀?‍♀
✍©
बाबू लाल शर्मा, बौहरा
सिकंदरा,303326
दौसा,राजस्थान,9782924479
???????
७—————बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
*प्रीत सरसे*
. ? ?
नेह की सौगा़त पाई
लग गया मन खिलखिलाने!

ऋतु सुहानी सावनी में
पवन पुरवाई चली है‌!
मेघ छायाँ कर रहे ज्यों,
भीगते आँगन गली है!
मोर वन मन नाचते है
फिर चले कैसे बहाने!
नेह की सौगात पाई
लग गया मन खिलखिलाने!

गंध तन की भा रही ज्यों,
गंध सौंधी सावनी सी!
नेह बरसे प्रीत सरसे
खेत में मन भावनी सी!
दामिनी दमकी, प्रिया भी
लिपट लगि साँसे बजाने!
नेह की सौगात पाई
लग गया मन खिलखिलाने!

तितलियों को देखता मन
कल्पना में उड़ रहा था!
भ्रमर गाता तन सुलगता
मेह रिमझिम पड़ रहा था!
पृष्ठ से दो हाथ आए
बँध गये बंधन सुहाने‌!
नेह की सौगत पाई
लग गया मन खिलखिलाने!

पुष्प गंधी, है प्रिया यह
इंद्रधनुष सी चुनरी तन!
कजरा गजरा बिँदिया से
बहका बहका लगे चमन!
पहल करे मन मोर नचे
तन निहारूँ मन रिँझाने।
नेह की सौगात पाई
लग गया मन खिलखिलाने।
. ———–
✍©
बाबू लाल शर्मा,बौहरा
सिकंदरा,303326
दौसा, राजस्थान, 9782924479
????????८ ————-बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
. *गीत*. *प्रीत सरसे*

नेह की सौगा़त पाई
लग गया मन खिलखिलाने!

ऋतु सुहानी सावनी में
पवन पुरवाई चली है‌!
मेघ छायाँ कर रहे ज्यों,
भीगते आँगन गली है!
मोर वन मन नाचते है
फिर चले कैसे बहाने!
नेह की सौगात पाई
लग गया मन खिलखिलाने!

गंध तन की भा रही ज्यों,
गंध सौंधी सावनी सी!
नेह बरसे प्रीत सरसे
खेत में मन भावनी सी!
दामिनी दमकी, प्रिया भी
लिपट लगि साँसे बजाने!
नेह की सौगात पाई
लग गया मन खिलखिलाने!

तितलियों को देखता मन
कल्पना में उड़ रहा था!
भ्रमर गाता तन सुलगता
मेह रिमझिम पड़ रहा था!
पृष्ठ से दो हाथ आए
बँध गये बंधन सुहाने‌!
नेह की सौगत पाई
लग गया मन खिलखिलाने!

पुष्प गंधी, है प्रिया यह
इंद्रधनुष सी चुनरी तन!
कजरा गजरा बिँदिया से
बहका बहका लगे चमन!
पहल करे मन मोर नचे
तन निहारूँ मन रिँझाने।
नेह की सौगात पाई
लग गया मन खिलखिलाने।

दीप का यह पर्व आया
देहरी सजने लगी है!
द्वार घर हँसते लगे सब
प्रेम की पींगे पगी है!
दीप का ले थाल आई
पर्व दर पर वह सजाने!
नेह की सौगात पाई
लग गया मन खिलखिलाने!

रीत निभे मन प्रीत पले
द्वार देहरी दीप सजे!
लक्ष्मी पूजे प्रेम धनी
हृदय तार प्रिय भजन बजे!
मन पावन मनमीत मिले
प्रियवर मन लगे हँसाने!
नेह की सौगात पाई
लग गया मन खिलखिलाने!
. ————-
✍©
बाबू लाल शर्मा,बौहरा
सिकंदरा,303326
दौसा,राजस्थान,9782924479
????????९ ~~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
. *गीत*
. ( लावणी छंद )
*मीरा जैसी बहिन मिले यदु,*
*भाग्यवान वह भाई है!*

जन्मों का होता है नाता,
भाई बहिन सम्बन्धों का!
बाकी रिश्ते मनुज बनाते,
जाला गोरख धन्धों का!
होता है मंजूर राम को,
बनते वे रिश्ताई हैं!
मीरा जैसी बहिन मिले यदु,
भाग्यवान वह भाई है!

कृष्ण सखा सम हैं मीरा के,
रचती पद्य अनोखे हैं!
सच पूछो तो मीरा मीरा,
समझ समय के धोखे हैं!
दोहे छंद और चौपाई,
बोली में कविताई है!
मीरा जैसी बहिन मिले यदु,
भाग्यवान वह भाई है!

सुता अनोखी मात पिता की,
पति की राज दुलारी है!
बेटे बेटी रिश्ते नाते,
सबको लगती प्यारी है!
अपना भी सौभाग्य सखे यह,
लगती कहाँ पराई है!
मीरा जैसी बहिन मिले यदु,
भाग्यवान वह भाई है!

सभी केवरा दीदी कहते,
मैं तो बहना कहता हूँ!
आए मिले कभी वह मुझसे,
पंथ ताकता रहता हूँ!
मैं भी बहना के दर जाऊँ,
आती याद मिठाई है!
मीरा जैसी बहिन मिले यदु,
भाग्यवान वह भाई है!
. ???
✍©
बाबू लाल शर्मा,बौहरा
सिकंदरा,३०३३२६
दौसा,राजस्थान,९७८२९२४४७९
????????१०~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
. *गीत*
. ?
आज दलदल में फँसे है, प्राण भी!
यह सरल मन चाहता अब, त्राण भी।

तन मन लगा है नयन शर , घाव है!
भटक रहा तन माँझी मन, नाव है!!
चंदा चुभता हिय लगे, कृपाण भी!
आज दलदल में फँसे हैं, प्राण भी!

बैरिन सम ऋतु बासंती, लग रही!
कूँक कोयल बन हलाहल, मन बही!!
पढ़े मन अब चाह गरुड पुराण भी!
आज दलदल में फँसे है, प्राण भी!!

झूठे हृदय ठगे माया, रीति से!
सदा पालता जग रिपुता,प्रीति से!!
लगता है दिल होता पाषाण भी!
आज दलदल में फँसे हैं, प्राण भी!!
. ???
✍©
बाबू लाल शर्मा बौहरा
सिकंदरा,दौसा, राजस्थान
????????११~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
. *गीत / नवगीत*
. °°°°°°°
बादलो ने ली अंगड़ाई,
खिलखलाई यह धरा भी!
हर्षित हुए भू देव सारे,
कसमसाई अप्सरा भी!

कृषक खेत हल जोत सुधारे,
बैल संग हल से यारी !
गर्म जेठ का महिना तपता,
विकल जीव जीवन भारी!
सरवर नदियाँ बाँध रिक्त जल,
बचा न अब नीर जरा भी!
बादलों ने ली अंगड़ाई,
खिलखिलाई यह धरा भी!

घन श्याम वर्णी हो रहा नभ,
चहकने खग भी लगे हैं!
झूमती पुरवाई आ गई,
स्वेद कण तन से भगे हैं!
झकझोर झूमे पेड़ द्रुमदल,
चहचहाई है बया भी!
बादलों ने ली अंगड़ाई,
खिलखिलाई यह धरा भी!

जल नेह झर झर बादलों का,
बूँद बन कर के टपकता!
वह आ गया चातक पपीहा,
स्वाति जल को है लपकता!
जल नेह से तर भीग चुनरी,
रंग आएगा हरा भी!
बादलों ने ली अंगड़ाई,
खिलखिलाई यह धरा भी!
. °°°°°°°°°
✍©
बाबू लाल शर्मा,बौहरा
सिकंदरा,दौसा, राजस्थान
?????????
१२~~~~~बाबूलालशर्मा. *विज्ञ*
. *भक्ति गीत*
. . (१६,१४मात्रिक)
. °°°°
. ???
. °°°°°
हे नीलकंठ शिव महाकाल,
भूतनाथ हे अविनाशी!
हिमराजा के जामाता शिव,
गौरा के मन हिय वासी!

देवों के सरदार सदाशिव,
राम सिया के हो प्यारे!
करो जगत कल्याण महा प्रभु,
संकट हरलो जग सारे!
सागर मंथन से विष पीकर,
बने देव हित विश्वासी!
हे नीलकंठ शिव महाकाल,
भूतनाथ हे अविनासी!

भस्म रमाए शीश चंद्र छवि,
गंगा धारा जट धारी!
नाग लिपटते कंठ सोहते,
संग विनायक महतारी!
हे रामेश्वर जग परमेश्वर,
कैलासी पर्वत वासी!
हे नीलकंठ शिव महाकाल,
भूतनाथ हे अविनाशी!

आँक धतूरे भंग खुराकी,
कृपा सिंधु अवढरदानी!
वत्सल शरणागत जग पालक,
त्रय लोचन अविचल ध्यानी!
आशुतोष हे अभ्यंकर हे,
विश्वनाथ हे शिवकाशी!
हे नीलकंठ शिव महाकाल,
भूतनाथ हे अविनाशी!
• °°°°°°°°°°
✍©
बाबू लाल शर्मा बौहरा
सिकंदरा दौसा राजस्थान
???????
१३~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
. *गीत/नवगीत*
. (१६,१२)
*पत्थर दिल कब पिघले*
. ••••••
लता लता को खाना चाहे,
कली कली को निँगले!
शिक्षा के उत्तम स्वर फूटे,
जो रागों को निँगले!

सत्य बिके नित चौराहे पर,
गिरवी आस रखी है
दूध दही घी डिब्बा बंदी,
मदिरा खुली रखी है!
विश्वासों की हत्या होती,
पत्थर दिल कब पिघले!
लता लता को खाना चाहे
कली कली को निँगले!

गला घुटा है यहाँ न्याय का,
ईमानों का सौदा!
कर्ज करें घी पीने वाले
चाहे बिके घरौंदा!
होड़ा होड़ी मची निँगोड़ी,
किस्से भूले पिछले!
लता लता को खाना चाहे,
कली कली को निँगले!

अण्डे मदिरा मांस बिक रहे,
महँगे दामों ठप्पे से!
हरे साग मक्खन गुड़ मट्ठा,
गायब चप्पे चप्पे से!
पढ़े लिखे ही मौन मूक हो,
मोबाइल से निकले!
लता लता को खाना चाहे,
कली कली को निँगले!

बेटी हित में भाषण झाड़े,
भ्रूण लिंग जँचवाते!
कहें दहेजी रीति विरोधी,
बहु को वही जलाते!
आदर्शो की जला होलिका
कर्म करें नित निचले!
लता लता को खाना चाहे,
कली कली को निँगले!

संस्कारों को फेंक रहे सब,
नित कचरा ढेरों में!
मात पिता वृद्धाश्रम भेजें
प्रीत ढूँढ गैरों में!
वृद्ध करे केशों को काले,
भीड़ भाड़ में पिट ले!
लता लता को खाना चाहे,
कली कली को निँगले!
. ??‍♀??‍♀??‍♀
✍©
बाबू लाल शर्मा बौहरा
सिकंदरा दौसा राजस्थान
????१४~~~~~~~~बाबूलालशर्मा. *विज्ञ*
. *गीत/नवगीत*
. (१६,७)
. *हारे जीत*
. °°°°°°°°
पीर जलाए आज विरह फिर,बनती रीत!
लम्बी विकट रात बिन नींदे, पुरवा शीत!

लगता जैसे बीत गया युग, प्यार किये!
जीर्ण वसन हो बटन टूटते, कौन सिँए!
मिलन नहीं भूले से अब तो, बिछुड़े मीत!
पीर जलाए आज विरह फिर, बनती रीत!

याद रहीं बस याद तुम्हारी, भोली बात!
बाकी तो सब जीवन अपने, खाए घात!
कविता छंद भुलाकर लिखता, सनकी गीत!
पीर जलाए आज विरह फिर, बनती रीत!

नेह प्रेम में रूठ झगड़ना, मचना शोर!
हर दिन ईद दिवाली जैसे, जगना भोर!
हर निर्णय में हिस्सा किस्सा, हारे जीत!
पीर जलाए आज विरह फिर,बनती रीत!

याद सताती तन सुलगाती, बढ़ती पीर!
जितना भी मन को समझाऊँ, घटता धीर!
हुआ चिड़चिड़ा जीवन सजनी,नैन विनीत!
पीर जलाए आज विरह फिर, बनती रीत!

प्रीत रीत की ऋतुएँ रीती, होती साँझ!
सुर सरगम मय तान सुरीली, बंशी बाँझ!
सोच अगम पथ प्रीत पावनी, मन भयभीत!
पीर जलाए आज विरह फिर, बनती रीत!

सात जन्म का बंधन कह कर, बहके मान!
आज अधूरी प्रीत रीत जन, मन पहचान!
यह जीवन तो लगे प्रिया अब, जाना बीत!
पीर जलाए आज विरह फिर, बनती रीत!
. °°°°°°°°°°°°
✍©
बाबू लाल शर्मा बौहरा
सिकंदरा दौसा राज
????????
१५~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
. *गीत/नवगीत*
. ( १४,१४ )
*प्रीत की बाजी कसूरी*
. °°°°°°°°°°
कल्पना यह कल्पना है,
आपके बिन सब अधूरी।
गया भूल भी मधुशाला,
वह गुलाबी मद सरूरी।

सो रही है भोर अब यह,
जागरण हर यामिनी को।
प्रीत की ठग रीत बदली,
ठग रही है स्वामिनी को।
दोष देना दोष है अब,
प्रीत की बाजी कसूरी।
कल्पना यह कल्पना है,
आपके बिन सब अधूरी।

प्रीत भूले रीत को जब,
मन भटक जाता हमारा।
भूल जाता गात कँपता,
याद कर निश्चय तुम्हारा।
सत्य को पहचानता मन,
जगत की बाते फितूरी।
कल्पना यह कल्पना है,
आपके बिन सब अधूरी।

उड़ रहा खग नाव सा मन,
लौट कर आए वहीं पर।
सोच लूँ मन मे भले सब,
बात बस मन में रही हर।
प्रेम घट अवरोध जाते,
हो तनों मन में हजूरी।
कल्पना यह कल्पना है,
आपके बिन सब अधूरी।

प्रेम सपन,तन पाश लगे,
यह मन मे रही पिपासा।
शेष जगत में बची नहीं,
अपने मन में जिज्ञासा।
आओ तो जी भर देखूँ,
कर दो मन्शा यह पूरी।
कल्पना यह कल्पना है,
आपके बिन सब अधूरी।
. °°°°°°°
✍©
बाबू लाल शर्मा बौहरा
सिकंदरा दौसा राजस्थान
???????
१६~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
. *गीत / नवगीत*
. *कसमसाई अप्सरा भी*
. °°°°°°°
बादलो ने ली अंगड़ाई,
खिलखलाई यह धरा भी!
हर्षित हुए भू देव सारे,
कसमसाई अप्सरा भी!

कृषक खेत हल जोत सुधारे,
बैल संग हल से यारी !
गर्म जेठ का महिना तपता,
विकल जीव जीवन भारी!
सरवर नदियाँ बाँध रिक्त जल,
बचा न अब नीर जरा भी!
बादलों ने ली अंगड़ाई,
खिलखिलाई यह धरा भी!

घन श्याम वर्णी हो रहा नभ,
चहकने खग भी लगे हैं!
झूमती पुरवाई आ गई,
स्वेद कण तन से भगे हैं!
झकझोर झूमे पेड़ द्रुमदल,
चहचहाई है बया भी!
बादलों ने ली अंगड़ाई,
खिलखिलाई यह धरा भी!

जल नेह झर झर बादलों का,
बूँद बन कर के टपकता!
वह आ गया चातक पपीहा,
स्वाति जल को है लपकता!
जल नेह से तर भीग चुनरी,
रंग आएगा हरा भी!
बादलों ने ली अंगड़ाई,
खिलखिलाई यह धरा भी!
. °°°°°°°°°
✍©
बाबू लाल शर्मा,बौहरा
सिकंदरा,दौसा, राजस्थान
?
१७~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
. ? *गीत/नवगीत* ?
. ( १६,१६ )
. *संस्कारों की करते खेती*
. ??‍♀??‍♀
बीज रोप दे बंजर में कुछ,
यूँ कोई होंश नहीं खोता।
जन्म जात बातें जन सीखे,
वस्त्र कुल्हाड़ी से कब धोता।

संस्कृति अपनी गौरवशाली,
संस्कारों की करते खेती।
क्यों हम उनकी नकल उतारें,
जिनकी संस्कृति अभी पिछेती।
जब जब अपने फसल पकी थी,
पश्चिम रहा खेत ही बोता।
बीज रोप दे बंजर में कुछ,
यूँ कोई होंश नही खोता।

देश हमारा जग कल्याणी,
विश्व समाजी भाव हमारे।
वसुधा है परिवार सरीखी,
मानवता हित भाव उचारे।
दूर देश पहुँचे संदेशे,
धर्म गंग जन मारे गोता।
बीज रोप दे बंजर में कुछ,
यूँ कोई होंश नही खोता।

मातृभूमि माता सम मानित,
शरणागत हित दर खोले।
जब जब विपदा भू मानव पर,
तांडव कर शिव बम बम बोले।
गाय मात सम मानी हमने,
राम कृष्ण हरि कहता तोता।
बीज रोप दे बंजर में कुछ,
यूँ कोई होंश नही खोता।

जगत गुरू पहचान हमारी,
कनक विहग सम्मान रहा।
पश्चिम की आँधी में साथी,
क्यूँ तेरा मन बिन नीर बहा।
स्वर्ग तुल्य भू,गंगा हिमगिरि,
मन के पाप व्यर्थ क्यूँ ढोता।
बीज रोप दे बंजर में कुछ,
यूँ कोई होंश नही खोता।
. ??‍♀??‍♀
✍©
बाबू लाल शर्मा बौहरा
सिकंदरा,दौसा, राजस्थान
????????
१८~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
. *गीत/नवगीत*
. ( १६,१४ )
*स्वेद सुगंधित जग पहचाने*
. ?✍?
टूटे पंखों से लिख दूँ मैं,
बना लेखनी वह कविता।
स्वर दे दो मय भाव सनेही,
बह जाए मन की सरिता।

शब्द शब्द को ढूँढ़ ढूँढ़ कर,
भाव पिरो दूँ मन भावन।
ज्येष्ठ ताप पाठक को भाए,
जैसे रमणी को सावन।
मानव मानस मानवता हित,
छंद लिखूँ भव शुभ फलिता।
टूटे पंखों से लिख दूँ मैं,
बना लेखनी वह कविता।

बात बुजुर्गों के हित चित लिख,
याद दिला दूँ बचपन की।
बच्चों के कर्तव्य लिखूँ सब,
समझ जगा दूँ पचपन की।
बेटी बने सयानी पढ़ कर,
वृद्धा गाए बन बनिता।
टूटे पंखों से लिख दूँ मैं,
बना लेखनी वह कविता।

लिखूँ गुटरगूँ युगल कपोती,
नाच उठे वन तरुणाई।
मोर मोरनी नृत्य लिखूँ वन,
बाज बजाए शहनाई।
नीड़ सहेजे चील बया का,
सारस बक संगत चकिता।
टूटे पंखों से लिख दूँ मैं,
बना लेखनी वह कविता।

चातक पपिहा पीड़ा भूले,
काग करे पिक से यारी।
जंगल में मंगलमय फागुन,
शेर दहाड़ें भयहारी।
भालू चीता संगत चीतल,
रखें धरा को शुभ हरिता।
टूटे पंखों से लिख दूँ मैं,
बना लेखनी वह कविता।

श्रमिक किसानी पीड़ा हर लें,
ऐसे भाव लिखूँ सुख कर।
स्वेद सुगंधित जग पहचाने,
कहें प्रसाधन विपदा कर।
बने सत्य श्रम के जन साधक,
भाव हरे तन मन थकिता।
टूटे पंखों से लिख दूँ मैं,
बना लेखनी वह कविता।

राजनीति के धर्म लिखूँ कुछ,
पावन शासक शासन हो।
स्वच्छ बने सत्ता गलियारे,
सरकारें जन भावन हो।
ध्रुव तारे सम मतदाता बन,
नायक चुनलें भल भविता।
टूटे पंखों से लिख दूँ मैं,
बना लेखनी वह कविता।

प्रीत रीत से पाले जन मन,
खिला खिला जीवन महके।
कटुता द्वेष भूल हर मानव,
मानस मनुज हँसे चहके।
रिश्ते नाते निभें पड़ोसी,
याद करें क्यों नर अरिता।
टूटे पंखों से लिख दूँ मैं,
बना लेखनी वह कविता।

सोच विकासी भाव जगे भव,
भूल युद्ध बन अविकारी।
कर्तव्यों की होड़ मचे मन,
बात भूल जन अधिकारी।
देश देश में जगे बंधुता,
विश्व राज्य की मम कमिता।
टूटे पंखों से लिख दूँ मैं,
बना लेखनी वह कविता।

जय जवान लिख जय किसान की,
जय विज्ञान लिखूँ जग हित।
नारी का सम्मान करें सब,
बिटिया को लिख दूँ शुभ चित।
गौ धरती जग मात मान लें,
समझें जग पालक सविता।
टूटे पंखों से लिख दूँ मैं,
बना लेखनी वह कविता।

सागर नदी भूमि नभ प्राकृत,
मानवता के हित लिख दूँ।
लिख आभार पंख धर का मैं,
कलम शारदे पद रख दूँ।
पहले लिख कर निज मन मंशा,
भाव जगा माँ शुभ शुचिता।
टूटे पंखों से लिख दूँ मैं,
बना लेखनी वह कविता।
. ?✍?
✍©
बाबू लाल शर्मा *विज्ञ*
?????????
१९~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
? *गीत/नवगीत* ?
. (१२,१२)
*इक शिखण्डी चाहिए*
. °°°°°°°°°°°
पार्थ जैसा हो कठिन,
व्रत अखण्डी चाहिए।
*आज जीने के लिए,*
*इक शिखण्डी चाहिए।।*

देश अपना हो विजित,
धारणा ऐसी रखें।
शत्रु नानी याद कर,
स्वाद फिर ऐसा चखे।

सैन्य हो अक्षुण्य बस,
व्यूह् त्रिखण्डी चाहिए।।
आज जीने के…….

घर के भेदी को अब,
निश्चित सबक सिखाना।
आतंकी अपराधी,
को आँखे दिखलाना।

सुता बने लक्ष्मी सम,
भाव चण्डी चाहिए।।
आज जीने के…….।

सैन्य सीमा मीत अब,
हो सुरक्षित शान भी।
अकलंकित न्याय रखें,
सत्ता व ईमान भी।

सिर कटा ध्वज को रखे,
तन घमण्डी चाहिए।।
आज जीने………..।
. °°°°°°°°°
✍©
बाबू लाल शर्मा, बौहरा
सिकंदरा, दौसा, राजस्थान
?????????
२०~~~~ बाबूलालशर्मा. *विज्ञ*
? *गीत/ नवगीत* ?
. (१६,१४)
. *सूरज उगने वाला है*
. °°°°°°°°°°°°
मीत यामिनी ढलना तय है,
कब लग पाया ताला है।
*चीर तिमिर की छाती को अब,*
*सूरज उगने वाला है।।*

आशाओं के दीप जले नित,
विश्वासों की छाँया मे।
हिम्मत पौरुष भरे हुए है,
सुप्त जगे हर काया में।

जन मन में संगीत सजे है,
दिल में मान शिवाला है।
चीर तिमिर…………. ।

हर मानव है मस्तक धारी,
जिसमें ज्ञान भरा होता।
जागृत करना है बस मस्तक,
सागर तल जैसे गोता।

ढूँढ खोज कर रत्न जुटाने,
बने शुभ्र मणि माला है।
चीर ………………….।

सत्ता शासन सरकारों मे,
जनहित बोध जगाना है।
रीत बुराई भ्रष्टाचारी,
सबको दूर भगाना है।

मिले सभी अधिकार प्रजा को,
दोनो समय निवाला है।
चीर तिमिर……………..।

हम भी निज कर्तव्य निभाएँ,
बालक शिक्षित व्यवहारी।
देश धरा मर्यादा पालें,
सत्य आचरण हितकारी।

शोध परिश्रम करना होगा,
लाना हमे उजाला है।
चीर तिमिर …………..।
. ???
✍©
बाबू लाल शर्मा बौहरा
सिकंदरा,दौसा, राजस्थान
??????
२१~~~~~~~बाबूलालशर्मा. *विज्ञ*
. ? *नवगीत* ?
*छीन लिए सब गड़े दफीने*
. ? १६/१६ ?
धरा गाल हँसते हम देखे,
जल कूपों मय चूनर धानी।
घाव धरा तन फटी बिवाई
मानस अधम सोच क्यूँ ठानी।।

शस्य श्यामला कहते जिसको
पैंड पैंड पर पेड़ तलाई
शेर दहाड़ें, चीतल हाथी
जंगल थी मंगल तरुणाई

ग्रहण लगा या नजर किसी की,
नूर गये माँ लगे रुहानी
धरा गाल हँसते ……….।।

वसुधा को माता कह कह कर
छीन लिए सब गड़े दफीने
श्रम के साये ढूँढ रहे अब
छलनी हो नद पर्वत सीने

कैसे कब तक सह पाएगी
धरा मनुज की यह मनमानी
धरा गाल हँसते…….,।।

गला घोटते सरिताओं का
बाँध बना जल कैद किया है
कंकर रेत निकाल गर्भ से
पर्वत पर्वत चीर दिया है

धरा रक्त को चूस बहाया
रहा नही आँखों में पानी
धरा गाल हँसते….।।

तन के सब शृंगार उतारे
वन तरु वनज वन्य भी नाशे
ताप कार्बन भूत जिन्द सम
शाह बने वसुधा पर हासे

कंकरीट के जंगल हँसते
लिखते भू पर नाश कहानी
धरा गाल हँसते …..।।

घाव बने नासूर हजारों
फोड़े रोम रोम को छेदे
धूम्र प्रदूषण राकेटों से
ओजोन कवच मानव भेदे

घावों पर मल्हम लगवाए,
कौन पूत भू हित सिर दानी।
धरा गाल हँसते ……….।।
. ????
बाबू लाल शर्मा, विज्ञ
सिकंदरा,दौसा, राजस्थान
????????
२२~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
. ? *नवगीत* ?
. (१६,१४)
*गोरी दर्पण देख रही है*
. ??
नयन सीप से, दाड़िम दंती,
अधर पंखुरी, खोल सही।
मन मतवाली रेशम चूनर
गोरी .. दर्पण देख रही ।।

झीनी चूनर बणी ठणी सी
नयन कटोरी कजरारी
चिबुक सुहानी, नागिन वेणी
कटि तट झूमर शृंगारी

मोहित हो जाए दर्पण भी
पछुआ शीतल श्वाँस बही
अधर…………………।।

माँग सजी मोती से अनुपम
नथ टीका कुण्डल चमके
जल दर्शी है कंठ सुकंठी
कंठहार झिल मिल दमके

दर्पण क्या प्रति उत्तर देगा
मन मानस में खड़ग गही।
अधर……..।।

कंगन चूड़ी हिना प्रदर्शित
छिपा कभी यौवन अँगिया
लाल गुलाबी नील वर्ण में
यौवन वन महके बगिया

शायद मन नवनीत तुम्हारा
तन की चाहत मथन दही।
अधर………….।।

रात चाँदनी जैसी टिम टिम
धानी चूनर मय लहँगा
प्रीत पायलें कदली पद में
स्वप्न फले सावन महँगा

मन का अवगुंठन तो खोलो
प्रीत रीत की बात कही।
अधर…………………..।।
. °°°°°°°°°°°°
✍ ©
बाबू लाल शर्मा, विज्ञ
सिकंदरा,दौसा, राजस्थान
??????
२३~~~~बाबूलालशर्मा *’विज्ञ’*
. ? *नवगीत* ?
. (१४,१४)
*आज पंछी मौन सारे*
. °°°°°°°°
देख कर मौसम बिलखता
आज पंछी मौन सारे
शोर कल कल नद थमा है
टूटते बस तट किनारे।।

विश्व है बीमार या फिर
मौत का तांडव धरा पर
जीतना है युद्ध नित नित
व्याधियों का तम हरा कर

छा रहा नैराश्य नभ में
रो रहे मिल चंद्र तारे।
देख कर…………….।।

सिंधु में लहरें उठी बस
गर्जना क्यूँ खो गई है
पर्वतो से पीर बहती
दर्द की गंगा नई है

रोजड़े रख दिव्य आँखे
खेत फसलों को निहारे।
देख कर……………..।।

तितलियाँ लड़ती भ्रमर से
मेल फुनगी से ततैया
ओस आँखो की गई सब
झूठ कहते गाय मैया

प्रीति की सब रीत भूले
मीत धरते शर करारे।
देख कर………….।।

राज की बातें विषैली
गंध मद दर देवरों से
बैर बिकते थोक में अब
सत्य ले लो फुटकरों से

ज्ञान की आँधी रुकी क्यों
डूबते जल बिन शिकारे।
देख कर……………….।।
. ???
✍©
बाबू लाल शर्मा *विज्ञ*
सिकंदरा,दौसा, राजस्थान
?????????
२४~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
. ? *नवगीत* ?
. (१६,१४)
*प्रीत शेष है मीत धरा पर*
. ??‍♀???‍♀
प्रीत शेष है मीत धरा पर
रीत गीत शृंगार नवल।
बहे पुनीता यमुना गंगा
पावन नर्मद नद निर्मल।।

रोक सके कब बंधन जल को
कूल किनारे टूट बहे
आँखों से जब झरने चलते
सागर का इतिहास कहे

पके उम्र के संग नेह तब
नित्य खिले सर मनो कमल।
प्रीत……………………..।।

सरिताएँ सागर से मिलती
नेह नीर की ले गगरी
पर्वत पर्वत बाट जोहता
नेह सजा बैठी मँगरी

धरा करे घुर्णन परिकम्मा
दिनकर प्रीत पले अविरल।
प्रीत……………………..।।

चंदा पावन प्रीत निभाता
धरा बंधु नर का मामा
पहन चूनरी ओढ़ चंद्रिका
नेह बाँधती नित श्यामा

प्रेम पिरोये मन में आशा
भाव चंद्रिका सा उज्ज्वल।
प्रीत…………………….।।

संग तुम्हारे मैं गाऊँ अब,
तुम भी छंद लिखो मन से
बनूँ राधिका मुरली धर तुम
लिपट रहूँ मानस तन से

रख मन चंगा घर में गंगा
हुए केश शुभ शुभ्र धवल।
प्रीत……………………।।
. ???
✍ ©
बाबू लाल शर्मा *विज्ञ*
सिकंदरा,दौसा, राजस्थान
???२५~~~~~~बाबूलालशर्मा *’विज्ञ’*
. ? *नवगीत* ?
. (१४,१४)
*आज पंछी मौन सारे*
. °°°°°°°°
देख कर मौसम बिलखता
आज पंछी मौन सारे
शोर कल कल नद थमा है
टूटते विक्षत किनारे।।

विश्व है बीमार या फिर
मौत का तांडव धरा पर
जीतना है युद्ध नित नव
व्याधियों का तम हरा कर

छा रहा नैराश्य नभ में
रो रहे मिल चंद्र तारे।।।
देख कर…………….।।

सिंधु में लहरें उठी बस
गर्जना क्यूँ खो गई है
पर्वतो से पीर बहती
दर्द की गंगा नई है

रोजड़े रख दिव्य आँखे
खेत फसलों को निहारे।।
देख कर……………..।।

तितलियाँ लड़ती भ्रमर से
मेल फुनगी से ततैया
ओस आँखो की गई सब
झूठ कहते गाय मैया

प्रीति की सब रीत भूले
मीत धरते शर करारे।।
देख कर………….।।

राज की बातें विषैली
गंध मद दर देवरों से
बैर बिकते थोक में अब
सत्य ले लो फुटकरों से

ज्ञान की आँधी रुकी क्यों
डूबते जल बिन शिकारे।।
देख कर……………….।।
. ???
✍©
बाबू लाल शर्मा *विज्ञ*
सिकंदरा,दौसा, राजस्थान
?????????
२६~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
? *नवगीत* ?
. ( १६,१५ )
*मेरा भारत देश महान*
.. ???
पाटी पर खड़िया से लिख दूँ
मेरा भारत देश महान।
पढ़ लिख कर मैं कवि बन गाऊँ
भारत माता के गुणगान।।

बाबा चिन्ता मत कर मेरी
लौटेंगे बीते दिन रीत
दिनकर बनकर गीत लिखूँगा
छंद लिखूँगा माँ की प्रीत

गाएँगे सब शाम सवेरे
ऐसी लिखूँ तिरंगा तान।
पाटी……………….,..।।

पोथी कलम दिलाना मुझको
कुछ ही दिन बस सहने कष्ट
संग तुम्हारे चलूँ कमाने
विपदाएँ सब होंगी नष्ट

दिन में काम करेंगें मिलकर
तब लाएँ घर में सामान।
पाटी……………………..।।

याद मात की मुझे रुलाती
तुमको भी आती है याद
पढूँ लिखूँ घर उन्नत होगा
तभी मिटेंगे मनो विषाद

हुलसी के तुलसी सा हूँ मै
लिख दूँगा नूतन विज्ञान।
पाटी……………………..।।

रीति प्रीति की बात लिखूँ सब
केशव से कविताई छंद
देश धरा की लिखूँ वंदना
मन के सपने जीवन द्वंद

माँ का विरह, त्याग बापू का
निज मन का लिख दूँ अज्ञान।
पाटी……………………….।।
. ???
बाबू लाल शर्मा *विज्ञ*
बौहरा भवन
सिकंदरा,दौसा, राजस्थान
?????????
?????????
२७~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
? *नवगीत* ?
*आज लेखनी …*
. *…रुकने मत दो*
. ( १६,१४ )
. ??‍♀??‍♀
आज लेखनी,रुकने मत दो
गीत स्वच्छ भारत लिखना।
दूजे कर में झाड़ू लेकर,
घर आँगन तन सा रखना।।

आदर्शो की जले न होली
मेरी चिता जले तो जल
कलम बचेगी शब्द अमर कर,
स्वच्छ पीढ़ि सीखें अविरल

रुके नही श्वाँसों से पहले
फले लेखनी का सपना।
आज……………………।।

स्वच्छ रखूँ साहित्य हिन्द का
विश्व देश अपना सारा
शहर गाँव परिवेश स्वच्छ लिख
चिर सपने निज चौबारा

अपनी श्वाँस थमे तो थम ले,
तय है मृत्यु स्वाद चखना।
आज………………………।।

एक हाथ में थाम लेखनी,
मन के भाव निकलने दो
भाव गीत ऐसे रच डालो,
जन के भाव सुलगने दो

खून उबलने जब लग जाए,
बोलें जन गण मन अपना।
आज……………………,।।

सवा अरब सीनों की ताकत,
हर संकट पर भारी है
ढाई अरब जब हाथ उठेंगे,
कर पूरी तैयारी है

सुनकर सिंह नाद भारत का,
नष्ट वायरस, तय तपना।
आज……………………।।
. ???
✍©
बाबू लाल शर्मा *विज्ञ*
बौहरा भवन
सिकदरा,303326
दौसा,राजस्थान,9782924479
???????२८~~~~~~बाबूलालशर्मा, *विज्ञ*
. ? *नवगीत* ?
. (१६,१६)
*मन वीणा झंकृत हो जाए*
. ??‍♀???‍♀
एक गीत ऐसा मैं लिख दूँ,
मन वीणा झंकृत हो जाए।
नाच उठे तन पाखी बन के
कर्कश कंठ मधुर रस गाए।।

मेरे मन के कलुष भाव सब
मेघ घटा बन नेहिल घुमड़े
पर्वत जैसी पीर पिघल कर
नेह नीर नदिया बन उमड़े

कटु अनुभव मन हँडिया रीते
अनुभव सुखद समा हरषाए।
नाच उठे…………………..।।

छंद ज्ञान कविताई भूलूँ
केवल ताल हृदय की सुन लूँ
बंद कक्ष में मन की वीणा
होंठ हिला मानस की धुन लूँ

दंत जीभ का रास रचे तब
दीवारें छत कान लगाए।
नाच उठे तन पाखी……..।।

रीत प्रीत मय भूल मिताई
स्वयं सिद्ध मानवता गाऊँ
सुनू सुनाऊँ नहीं किसी को
मन वीणा के तार हिलाऊँ

तन की नाड़ी हृदय टटोलूँ
आँखे सुखद स्वप्न बरषाए।
नाच उठे………………..।।
. ???
✍©
बाबू लाल शर्मा *विज्ञ*
सिकंदरा,दौसा, राजस्थान
?????????
२९~~~~~ ~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
?? *नवगीत* ??
. *कहानी मोड़ मन मानस*
. ???‍♀??‍♀?
कहानी मोड़ मन मानस
उदासी छोड़नी होगी।
पिपासा पीर विश्वासी
निराशा भूल मन योगी।।

गरीबी की नहीं गिनती
दुखों का जब पहाड़ा हो
नही बेघर नदी समझो
किनारा तल अखाड़ा ।
वृथा भटको नहीं बादल
विरह पथ दर्द संयोगी।,।

उजाले भूल मन चातक
अँधेरे सिंधु से ले लो
बहे सावन दृगों से ही
अकालों का यजन झेलो
बहे गंगा कठौती में
किसानी श्वेद श्रम भोगी।

बनाले मीत वर्णों को
लिखो हर पीर परिजन सी
बसे परिवार छंदों के
सृजन कविता प्रिया तन स
वियोगी घन उठो बन कर
सृजन संगीत संभोगी।।

नदी की धार सम पर्वत
पराई पीर हरनी है
समंदर प्रीति का खाली
जगत की गंद भरना ।
तपन से भाप बन उड़ना
बरसना खूब घन जोगी।।

दुखों के ताल रीते कर
तलाई बो मिताई की
नहर बाँधों नदी नालों
सनेही मन सिँचाई की ।
मिटा अक्षर अभावों के
सँभलना आज मन रोग।।
. ?????
✍©
बाबू लाल शर्मा *विज्ञ*
बौहरा भवन, सिकंदरा,
दौसा,राजस्थान ९७८२९२४४७९
?????????
३०~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
?? *नवगीत* ??
*नेह की बरसात पावन*
. ??‍♀
चाह सागर से मिलन की
पर्वतों से पीर पलती।
मोम की मूरत समंदर
प्रीत की नदिया मचलती।।

नेत्र खोले झाँकता मुख
नेह की बरसात पावन
दर्द की सौगात खुशियाँ
जन्म दृग ले नित्य सावन

पाहनों को चूम कर ही
नीर ले नर्मद निकलती।

मोम के पुतले बुलाते
मौन आँखों के इशारे
नाव बिन माँझी चली है
रेत के सागर किनारे

केश कंटक से चुभे कर
गाल पर गंगा छलकती।

पेड़ से लिपटी लता को
खींच चूमे रेत के कण
आँधियों के ज्वार भाटे
सिंधु थामें आवरण

नासिका की श्वाँस से तप
आह की दरिया झलकती।

जब छुए पाहन हृदय को
मेघ सा मन हिय धड़कता
बन्द आँखो की लपट वन
कौंध नभमंडल कड़कता

मूर्ति से अभिसार करती
जाह्नवी धारा उछलती।
चाह सागर ………….
. ???
✍©
बाबू लाल शर्मा *विज्ञ*
सिकंदरा,दौसा, राजस्थान
????????
३१~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
???‍♀ *नवगीत* ??‍♀?
*शयन कक्ष भी थर थर काँपे*
. ???
सन्नाटों के कोलाहल में
नदियों के यौवन पर पहरा।
लम्पट पोखर ताल तलैया
सोच रहे सागर से गहरा।।
. १
ज्वार उठा सागर में भारी
लहरों का उतरा है गहना
डरे हुए आँधी अँधियारे
वृक्ष गर्त में ठाने रहना।

मन पंछी उन्मुक्त गगन उड़
वापस नीड़ों में आ ठहरा।
. २
खेत खेत सूखी तरुणाई
मुख पर चीर दुपट्टा बाँधे
काल कहार मसलते देखो
तेल हाथ ले अपने काँधे

जूहू चौपाटी नदिया तट
रक्तबीज का झण्डा फहरा।
. ३
कंचन कामी तरुण कामिनी
लता चमेली मुँह को ढाँपे
प्रेम गली पथ दीवारें तम
शयन कक्ष भी थर थर काँपे

मीत मिताई रिश्ते नाते
रोक पंथ ही पढे ककहरा।
. ४
चौक चाँदनी जंतर मंतर
पगडंडी पथ गलियारों के
घूँघट के पट लगे हुए हैं
माँझी नद खेवनहारों के
लाशें शोर मचाएँ भारी
पुतले देखें दहन दशहरा।
सन्नाटों के…………..।।
. ???
✍©
बाबू लाल शर्मा *विज्ञ*
बौहरा – भवन, ९७८२९२४४७९
सिकंदरा ,दौसा, राजस्थान ३०३३२६
??‍♀??‍♀??‍♀??‍♀??‍♀??‍♀??‍♀??‍♀??‍♀
३२~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
?? *नवगीत* ??
??‍♀ *काग चील हँस रहे* ??‍♀
. °°°°°°°
गीत ढाल बन रहे
.स्वप्न साज ढह गए
. पीत वर्ण पेड़ हो
. झूलते विरह गये

देश देश की खबर
. काग चील हँस रहे
. मौन कोकिला हुई
. काल ब्याल डस रहे
. लाश लापता सभी
मेघ शोक कह गये।
पीत…………….।।

शून्य पंथ ताकते
. रीत प्रीत रो पड़ी
. मानवीय भावना
. संग रोग हथकड़ी
. दूरियाँ सहेज ली
धूप ले सुबह गये।
पीत………….।।

खेत में फसल पकी
. ले किसान कब दवा
. तीर विष भरे लिए
. मौन साधती हवा
. होंठ सूख कर स्वयं
अश्रु मीत बह गये।
पीत……………।।

देव स्वर्ग में बसे
. काल दूत डोलते
. रक्त बीज बो रहे
. गरल गंध घोलते
. नव विषाणु फौज के
खिल रहे कलह नये
पीत……………..।।
. °°°°°°°
✍©
बाबू लाल शर्मा *विज्ञ*
बौहरा भवन
सिकंदरा,दौसा, राजस्थान
????????
३३~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
. …? *गीत* ?
? *जन चरित्र की शक्ति* ?
. ???
भू पर विपदा आज
ठनी है भारी।
संकट में है विश्व
प्रजा अब सारी।।

चिंतित हैं हर देश
विदेशी जन से
चाहे सब एकांत
बचें तन तन से
घातक है यह रोग
डरे नर नारी।
भू पर ……….।।

तोड़ो इसका चक्र
सभी यों कहते
घर के अंदर बन्द
तभी सब रहते
पालन करना मीत
नियम सरकारी
भू प…………….।।

शासन को सहयोग
करें भारत जन
तभी मिटेगा रोग
सुखी हों सब तन
दिन बीते इक्कीस
मिटे बीमारी
भू …………………।।

भारत माँ की शान
बचानी होगी
जन चरित्र की शक्ति
दिखानी होगी
भारत का हो मान
जगत आभारी।
भू पर………….।।

प्यारा हमको देश
वतन के वासी
पूरे कर कर्तव्य
जगत विश्वासी
है पावन संकल्प
मनुज हितकारी।
भू पर विपदा आज
ठनी है भारी।।
. ???
✍©
बाबू लाल शर्मा *विज्ञ*
बौहरा भवन ३०३३२६
सिकंदरा,
दौसा, राजस्थान,
?????????
३४~~~~~~~ बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
.?? *गीत* ??
*सूनी सूनी संध्या भोर*
. ???
काली काली लगे चाँदनी
चातक करता नवल प्रयोग।
बदले बदले मानस लगते
रिश्तों का रीता उपयोग।।

हवा चुभे कंटक पथ चलते
नीड़ों मे दम घुटता आज
काँप रहा पीला रथ रवि का
सिंहासन देता आवाज
झोंपड़ियाँ हैं गीली गीली
इमारतों में सिमटे लोग।
बदले…………………।।

गगन पथों को भूले नभचर,
सागर में स्थिर है जलयान
रेलों की सीटी सुनने को
वृद्ध जनों के तरसे कान
करे रोजड़े खेत सुरक्षा
भेड़ करें उपवासी योग।
बदले………………..।।

हाट हाट पर उल्लू चीखे
चमगादड़ के घर घर शोर
हरीतिमा भी हुई अभागिन
सूनी सूनी संध्या भोर
प्राकृत का संकोच बढ़ा है
नीरवता का शुभ संयोग।
बदले…………………।।
. ???
✍©
बाबू लाल शर्मा *विज्ञ*
बौहरा-भवन सिकंदरा,३०३३२६
दौसा, राजस्थान,
?????????
३५~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
?? *गीत* ??
. *इंद्रधनुष के रंग उड़े हैं*
. °°°°°°°°°°
इन्द्र धनुष के रंग उड़े हैं
. देख धरा की तरुणाई।
छीन लिए हाथों के कंगन
. धूम्र रेख नभ में छाई।।

सुंदर सूरत का अपराधी
. मूरत सुंदर गढ़ता है
कौंध दामिनी ताक ताक पथ
. चन्दा नभ में चढ़ता है
. नारी का शृंगार लुटेरा
पाहन लगता सुखदाई।
इन्द्रधनुष…………..।।

यौवन किया तिरोहित नभ पर
. भू को गौतम शाप मिले
. बने छली शशि इंद्र विधाता
भग्न हृदय को कौन सिले
. छंद लिखे मन गीत चितेरे
पाहन पवनी चतुराई।
इन्द्र…………………।।

रेत करे आराधन घन का
. खजुराहो पथ मेघ चले
. भूल चकोरी का प्रण चंदा
. छिपे नयन की छाँव तले
. पुरवाई की बाट निहारे
. सागर चाहे ठकुराई।
इन्द्र धनुष के रंग उड़े हैं
देख ..धरा की तरुणाई।।
. ???
✍©
बाबू लाल शर्मा *विज्ञ*
बौहरा-भवन ३०३३२७
सिकंदरा,दौसा, राजस्थान
?????????
३६~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
?? *नवगीत* ??
*शूल सै अब प्रीत पलती*
. ???‍♀?
भागे भँवरे ताप देखकर
शूल से अब प्रीत पलती।
मरुस्थली का नेह पाकर
विरह की गंगा छलकती।।

गगन भाल की बिंदी रूठी
रात अमावस चमक रही
रंग बहे गंगा की धारा
श्वेत वसन तन दमक रही

पीर विरह में डूब चकोरी
लगती संध्या सी ढलती।
मकरंद……………….।।

सागर में मिल नदिया अपना
बिम्ब खोजती पानी में
ओस जमी सूखी रेती पर
आँसू की मनमानी में

अवगुंठन में सूखी पलकें
आँसू की श्रद्धा छलती।
मकरंद……………….।।

रीत प्रीत आकाशी खेती
संयोगों की आशा है
बरसाती नालो से भू की
बुझती कहाँ पिपासा है

नेह मेह चाहत में वसुधा।
प्रिय घन की माला भजती।
मकरंद………………….।।
. ???
✍©
बाबू लाल शर्मा *विज्ञ*
बौहरा-भवन
सिकंदरा दौसा राजस्थान
??????
३७ ~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
. ? *नवगीत* ?
*कवि से रूठ लेखनी छिटके*
. ??
रूठ भले कैसे गाएँगे
विलग चंद्रिका से राकेश।
रश्मिरथी से बना दूरियाँ
कब दमके नभ घन आवेश।।

नित्य शिलाओं से टकराए
बहती गंगा अविरल धार
नौकाएँ जल चीर चीर कर
करे पथिक को नदिया पार
प्राकृत सृष्टा मेल रहे तब
खिलता है नूतन परिवेश।
रूठ…………………..।।

धरा रूठ कर शशि से कैसे
धवल चंद्रिका ओढे नित्य
सागर पर्वत ग्रह पिण्डों को
उर्जा देता है आदित्य
करे नही वे भेद किसी से
सम रखते हर देश विदेश।
रूठ…………………….।।

व्रती चातकी शशि को ताके
व्याकुल उल्लू चीखे रात
चकवा चकवी नित्य बिछुड़ते
करते रहते दिन भर बात
चकमक देता अग्नि तभी जब
संघर्षण हो मीत विशेष।
रूठ………………….।।

छंद रूठ जाए कविता से
जल बिन जीए कैसे मीन
कवि से रूठ लेखनी छिटके
स्वर देगी फिर कैसे बीन
सात स्वरों के इंद्रधनुष को
देख खिले घन श्यामल वेश।
रूठ……………………..।।

मनो मनाओ श्यामल केशी
विलग करो मत वीणा तार
शब्द लेखनी कवि मिल रचिए
नव गीतों से नव संसार
मन में प्राकृत भाव पिरो लो
बिम्ब रहे क्यों कोई शेष।
रूठ………………….।।
. ???‍♀?
✍©
बाबू लाल शर्मा *विज्ञ*
सिकंदरा,दौसा,राजस्थान
?????????
३८ ~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
. ? *नवगीत* ?
*पंथ तितली का निहारे*
. ???
मेघ सागर सा हृदय ले
पंथ तितली का निहारे।
छंद मन में गुन गुना कर
उम्र सावन की विचारे।।

ले कुहासा भोर जगती
धुंध की चादर लपेटे
मेघ धरती पर उतर कर
साँझ की शैय्या समेटे

बाग की आशा सुलगती
भृंग का पथ रथ सँवारे।
मेघ………………..।।

शीत में सावन सरसता
प्रीत की बदरी लुभाए
आग हिय में भर सके वह
पुष्प ही नव गंध लाए

बिजलियों की आस लेकर
चंद्र भी भूला सितारे।
मेघ……………….।।

नाव बिन माँझी सरकती
रेत की पगडंडियों में
नेह की पतवार बिकती
आसमानी मंडियों में

गीत सुन सुन कर हवाएँ
आँधियों का रूप धारे।
मेघ…………………।।

प्यास से व्याकुल हुआ घन
ओस सुमनो की टटोले
आस भँवरे में जगी है
गीत गा कर मन सतोले

फूल भर कर टोकरी में
सिंधु बैठा नद किनारे
मेघ सागर सा हृदय ले
पंथ तितली का निहारे।।
. ???
✍©
बाबू लाल शर्मा *विज्ञ*
बौहरा- भवन ३०३३२६
सिकंदरा, जिला-दौस
राजस्थान ९७८२९२४४७९
?????
३९~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
. ? *नवगीत* ?
*पंथ तितली का निहारे*
. ???
शांत सागर सा हृदय ले
मेघ बैठा नद किनारे।
छंद मन में गुन गुना कर
उम्र सावन की विचारे।।

ले कुहासा भोर जगती
धुंध की चादर लपेटे
मेघ धरती पर उतर कर
साँझ की शैय्या समेटे

बाग की आशा सुलगती
भृंग का पथ रथ सँवारे।
शांत………………..।।

शीत में सावन सरसता
प्रीत की बदरी लुभाए
आग हिय में भर सके वह
पुष्प ही नव गंध लाए

बिजलियों की आस लेकर
चंद्र भी भूला सितारे।
शांत………………।।

नाव बिन माँझी सरकती
रेत की पगडंडियों में
नेह की पतवार बिकती
आसमानी मंडियों में

गीत सुन सुन कर हवाएँ
आँधियों का रूप धारे।
शांंत………………..।।

प्यास से व्याकुल हुआ घन
ओस सुमनो को टटोले
आस भँवरे में जगी है
गीत गा कर मन सतोले

फूल का मन डोल जाता
पंथ तितली का निहारे।
शांत सागर सा हृदय ले
मेघ ..बैठा नद किनारे।।
. ???
✍©
बाबू लाल शर्मा *विज्ञ*
बौहरा- भवन ३०३३२६
सिकंदरा, जिला-दौसा
राजस्थान ९७८२९२४४७९
?????????
४०~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
. *गीत*
. ? *मन भँवरा नर देह* ?
. ??
भोर कुहासा शीत ऋतु
तैर रहे घन मेह।
बगिया समझे आपदा
वन तरु समझे नेह।।
.
तृषित पपीहा जेठ में
करे मेह हित शोर
पावस समझे आपदा
कोयल कामी चोर

करे फूल से नेह वह
मन भँवराँ नर देह।
भोर……………..।।
.
ऋतु बासंती आपदा
सावन सिमटे नैन
विरहा तन मन कोकिला
खोये मानस चैन

पंथ निहारे गेह का
याद करे हिय गेह।
भोर…………….।।

याद सिंधु को कर रहा
भटका मन घन श्याम
नेह नीर के भार को
ढोता तन अविराम।

दुख में सुख को ढूँढता
मन को करे विदेह।
भोर……………..।।

गई प्रीत की रीत क्या
पावन प्रणय विवाद
देख नया युग नौ दिवस
रही पुरानी याद

डूब रहा अलि द्वंद में
कुसुमित रस संदेह।
भोर…………….।।

. ????
✍©
बाबू लाल शर्मा *विज्ञ*
सिकंदरा,दौसा,राजस्थान
???????
४१~~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
?? *नवगीत* ??
*स्वर्ण की सीढ़ी चढी है*
. ?
चाँदनी उतरी सुनहली
देख वसुधा जगमगाई।
ताकते सपने सितारे
अप्सरा मन में लजाई।।

शंख फूँका यौवनों में
मीत ढूँढे कोकिलाएँ
सागरों में डूबने हित
सरित बहती गीत गाएँ

पोखरों में ज्वार आया
झील बापी कसमसाई।
चाँदनी……………….।।

हार कवि ने मान ली है
लेखनी थक दूर छिटकी
भूल ता अम्बर धड़कना
आँधियों की श्वाँस अटकी

आँख लड़ती पुतलियों से
देख ती बिन डबडबाई।
चांदनी………… ……।।

घन घटाएँ ओढ़नी नव
तारिकाओं से जड़ी है
हिम पहाड़ी वैभवी हो
स्वर्ण की सीढी चढी है

शीश वेणी वन लताएँ
चातकी भी खिलखिलाई।
चाँदनी…………………।।

स्वप्न देखें जागत़े तरु
गीत नींदे सुन रही है
भृंग की गुंजार वन में
काम की सरिता बही है

*विज्ञ* पर्वत झूमते मृग
सृष्टि सारी चहचहाई।
चाँदनी…………….।।
. ???
✍©
बाबू लाल शर्मा *विज्ञ*
बौहरा-भवन
सिकंदरा ३०३३२६
दौसा, राजस्थान,
??????४२~~~~~~~बाबूलालशर्मा *विज्ञ*
. ?? *नवगीत* ??
? *मीन सिंधु में दहक रही* ?
. ??
बड़वानल की लपटों में घिर
मीन सिंधु में दहक रही।
आग हृदय की कौन बुझाए
नदियाँ झीलें धधक रही।।

मौन हुई बागों में बुल बुल
धुँआ घुली है पुरवाई
सन्नाटों के ढोल बजे हैं
शोक मनाए शहनाई

अमराई में बौर झरे सब
बया रुदन मय चहक रही।
बड़वानल……………….।।

सृष्टा का वरदान बताकर
शोषण किया धरोहर का
भँवरे ने भी खून पिया बस
ताजी कली मनोहर का

शान फूल की रही तभी तक
जब तक तन में महक रही।
बड़वानल………………..।।

सागर की लहरें भी छिपने
भँवरों में गोते खाती
चीख पुकार सुने सीपी की
कछुए की भरती छाती

मेघ देखते खड़े तमाशे
स्वाति बूंद बस फफक रही।
बड़वानल………………..।।

चिनगारी को ढूँढ रहें है
सूरज से राकेश मिले
साक्ष नहीं दे कोई तारा
ऋण धन के आवेश मिले

पीड़ित होकर मातृ साधना
लाचारी में सिसक रही।
बड़वानल……………।।
. ???
✍©
बाबू लाल शर्मा *विज्ञ*
वरिष्ठ अध्यापक
बौहरा – भवन
सिकंदरा, ३०३३२६
दौसा, राजस्थान,९७८२९२४४७९
?????????

(Visited 21 times, 1 visits today)

प्रातिक्रिया दे