KAVITA BAHAR
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घाम के महीना छत्तीसगढ़ी कविता

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घाम के महीना छत्तीसगढ़ी कविता


नदिया के तीर अमरइया के छांव हे।
अब तो बिलम जा कइथव मोर नदी तीर गांव हे।।

जेठ के मंझनिया के बेरा म तिपत भोंमरा हे।
खरे मंझनिया के बेरा म उड़त हवा बड़ोरा हे।।
बिन पनही के छाला परत तोर पांव हे।
मोर मया पिरित के तोर बर जुर छांव हे।।


खोर गली चवरा सब सुन्ना पर गे हे।
तरिया नरवा डबरा सब सुख्खा पर गे हे।।
सुरूज नारायण अंगरा बरसावत हे।
नवटप्पा ले पान पतइ भाजी कस अइलावत हे।।


ए घाम ले जम्मो चिरइ चिरगुन पानी बर तरपत हे।
मनखे मन घलो पानी के एकक बूंद बर तरसत हे।।
रद्दा रेंगइया रुख-राई के छइहां खोजत हे।
ठौर ठौर म करसी हड़िया के पानी पियात हे।।


लइका मन के गुरतुर सुघ्घर बोली हे।
अमरइया म कुहुकत कारी कोइली हे।।
घाम ले जम्मो परानी ल भुंजत महीना जेठ हे।
मोर गाँव के मनखे म दया-मया के सुघ्घर बोली मीठ हे.


✍️पुनीत सूर्यवंशी

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