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गुलाब की जवानी- मनीभाई नवरत्न

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गुलाब की जवानी


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ये गुलाब का फूल
ना जाने कब से ,
किताब में दबा हुआ था।
सूख चुका है अब
ये घुटन से ।

इसकी लालिमा बदल गई
धीरे धीरे समय के साथ
कालिमा में।
खुशबू बिखरके रह गई
किताबी समां में ।

इसकी दास्तां कभी-कभी,
यादों में आ जाती है,
मुस्कुराहट बनके।
कल इसकी ताजगी ने
सब को लुभा था ।
प्यार से हर किसी ने
इसको चुमा था ।

पर नहीं अब वो बातें
क्या शबाब में कमी है?
मानो तो ,
इस गुलाब की जवानी
बिछड़ के चली गई ।

अब किसी और गुलाब के,
चर्चे हैं गली गली ।
पुरानी यादों में
खोया ये गुलाब
बिखरा दी है आंसू
तभी तो किताब में नमी है।
गुलाब का फूल सा है
सबकी यहां कहानी।

मनमोहक सी आती
सबकी यहां जवानी।
खिलना है, बिखरना है।
आना है, जाना है,
इसी का नाम तो है जिंदगानी।

✍मनीभाई”नवरत्न”

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