KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

हिन्दी गीत : गुलामी की कफन – मनीभाई नवरत्न

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गुलामी की कफन जला के , सजाया है गुलिस्तान।

महकता रहे गुल सा , अपना प्यारा हिंदुस्तान ।।
आज फिर दस्तक दे ना कयामत की वो घड़ियां
आगाह करती है, मेरी गीत की दास्तान ।।

हम क्या थे ,क्या हो चले ।
शूरवीरों की शहादत से बनी वजूद खो चले ।
आज के दिन का मिलना नहीं था आसान।
अपने ही घर में रह गये थे बन कर मेहमान।
धीमा-धीमा सुलगा अपना स्वाभिमान।
जब भगत राजगुरु सुखदेव ने दी
फांसी में झूल की अपनी जान ।
आज फुल को खिलाने के बजाय
कांटे के बीज बो चले ।
शूरवीरों की शहादत से बनी वजूद खो चले।

कुछ भटक गए हैं इंसानियत से
फैला रहे आतंक का साया।
मजहब का नाम देकर ,
डरा-धमकाकर जन्नत को श्मशान बनाया ।
फिर से चलनी होगी उन राहों में
जिन राहों को बापू और बाबा ने दिखाया।
प्रेम की गठरी छोड़के नफरत की बोरी ढो चले ।
शूरवीरों की शहादत से बनी वजूद खो चले।।

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