KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

गुरु नानक-मैथिलीशरण गुप्त

0 366

गुरु नानक-मैथिलीशरण गुप्त

कार्तिक पूर्णिमा गुरुनानक देव जयंती
कार्तिक पूर्णिमा गुरुनानक देव जयंती

मिल सकता है किसी जाति को
आत्मबोध से ही चैतन्य ;
नानक-सा उद्बोधक पाकर
हुआ पंचनद पुनरपि धन्य ।
साधे सिख गुरुओं ने अपने
दोनों लोक सहज-सज्ञान;
वर्त्तमान के साथ सुधी जन
करते हैं भावी का ध्यान ।
हुआ उचित ही वेदीकुल में
प्रथम प्रतिष्टित गुरु का वंश;
निश्चय नानक में विशेष था
उसी अकाल पुरुष का अंश;
सार्थक था ‘कल्याण’ जनक वह,
हुआ तभी तो यह गुरुलाभ;
‘तृप्ता’ हुई वस्तुत: जननी
पाकर ऐसा धन अमिताभ ।

पन्द्रहसौ छब्बीस विक्रमी
संवत् का वह कातिक मास,
जन्म समय है गुरु नानक का,-
जो है प्रकृत परिष्कृति-वास ।
जन-तनु-तृप्ति-हेतु धरती ने
दिया इक्षुरस युत बहु धान्य;
मनस्तृप्ति कर सुत माता ने
प्रकट किया यह विदित वदान्य ।
पाने लगा निरन्तर वय के
साथ बोध भी वह मतिमंत;
संवेदन आरंभ और है
आतम-निवेदन जिसका अन्त ।
आत्मबोध पाकर नानक को
रहता कैसे पर का भान ?
तृप्ति लाभ करते वे बहुधा
देकर सन्त जनों को दान ।
खेत चरे जाते थे उनके,
गाते थे वे हर्ष समेत-
“भर भर पेट चुगो री चिड़ियो,
हरि की चिड़ियां, हरि के खेत !”

वे गृहस्थ होकर त्यागी थे
न थे समोह न थे निस्नेह;
दो पुत्रों के मिष प्रकटे थे
उनके दोंनों भाव सदेह ।
तयागी था श्रीचन्द्र सहज ही
और संग्रही लक्ष्मीदास;
यों संसार-सिद्धि युत क्रम से
सफल हुआ उनका सन्यास ।
हुआ उदासी – मत – प्रवर्तक
मूल पुरुष श्रीचन्द्र स्टीक,
बढ़ते हैं सपूत गौरव से
आप बनाकर बनाकर अपनी लीक।
पैतृक धन का अवलम्बन तो
लेते हैं कापुरुष – कपूत,
भोगी भुजबल की विभूतियाँ
था वह लक्ष्मीदास सपूत ।
पुत्रवान होकर भी गुरु ने,
दिखलाकर आर्दश उदार,
कुलगत नहीं, शिष्य-गुणगत ही
रक्खा गदी का अधिकार ।

इसे विराग कहें हम उनका
अथवा अधिकाधिक अनुराग,
बढ़े लोक को अपनाने वे
करके क्षुद्र गेह का त्याग ।
प्रव्रज्या धारन की गुरु ने,
छोड़ बुद्ध सम अटल समाधि,
सन्त शान्ति पाते हैं मन में
हर हर कर औरों की आधि ।
अनुभव जन्य विचारों को निज
दे दे कर ‘वाणी’ का रूप
उन्हें कर्मणा कर दिखलाते
भग्यवान वे भावुक-भूप ।
एक धूर्त विस्मय की बातें
करता था गुरु बोले-‘जाव,
बड़े करामाती हो तुम तो
अन्न छोड़ कर पत्थर खाव ।’
वही पूर्व आदर्श हमारे
वेद विहित, वेदांत विशिष्ट,
दिये सरल भाषा में गुरु ने
हमें और था ही क्या इष्ट ?

उसी पोढ़ प्राचीन नीव पर
नूतन गृह-निर्माण समान
गुरु नानक के उपदेशों ने
खींचा हाल हमारा ध्यान ।
दृषदूती तट पर ऋषियों ने
गाये थे जो वैदिक मन्त्र ।
निज भाषा में भाव उन्हींके
नानक भरने लगे स्वतन्त्र ।
निर्भय होकर किया उन्होंने
साम्य धर्म का यहाँ प्रचार,
प्रीति नीति के साथ सभी को
शुभ कर्मों का है अधिकार ।
सारे, कर्मकाण्ड निष्फल हैं
न हो शुद्ध मन की यदि भक्ति,
भव्य भावना तभी फलेगी
जब होगी करने की शक्ति ।
यदि सतकर्म नहीं करते हो,
भरते नहीं विचार पुनीत,
तो जप-माला-तिलक व्यर्थ है,
उलटा बन्धन है उपवीत ।

परम पिता के पुत्र सभी सम,
कोई नहीं घृणा के योग्य;
भ्रातृभाव पूर्वक रह कर सब
पाओ सौख्य-शान्ति-आरोग्य
“काल कृपाण समान कठिन है,
शासक हैं हत्यारे घोर,”
रोक न सका उन्हें कहने से
शाही कारागार कठोर ।
अस्वीकृत कर दी नानक ने
यह कह कर बाबर की भेट-
“औरों की छीना झपटी कर
भरता है वह अपना पेट !”
जो सन्तोषी जीव नहीं हैं
क्यों न मचावेंगे वे लूट ?
लुटें कुटेंगे क्यों न भला वे
फैल रही है जिनमें फूट ?
मिले अनेक महापुरुषों से,
घूमे नानक देश विदेश;
सुने गये सर्वत्र चाव से
भाव भरे उनके उपदेश ।

हुए प्रथम उनके अनुयायी
शूद्रादिक ही श्रद्धायुक्त,
ग्लानि छोड़ गुरु को गौरव ही
हुआ उन्हें करके भय-मुक्त ।
छोटी श्रेणी ही में पहले
हो सकता है बड़ा प्रचार;
कर सकते हैं किसी तत्व को
प्रथम अतार्किक ही स्वीकार ।
समझे जाते थे समाज में
निन्दित; घृणित और जो नीच,
वे भी उसी एक आत्मा को
देख उठे अब अपने बीच ।
वाक्य-बीज बोये जो गुरु ने
क्रम से पाने लगे विकाश
यथा समय फल आये उनमें,
श्रममय सृजन, सहज है नाश ।
उन्हें सींचते रहे निरन्तर
आगे के गुरु-शिष्य सुधीर
बद्धमूल कर गये धन्य वे
देकर भी निज शोणित-नीर ।

You might also like
Leave A Reply

Your email address will not be published.