KAVITA BAHAR
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चोका:- हरित ग्राम

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हरित ग्राम…
हरी दीवार पर
पेड़ का चित्र।
छाया कहीं भी नहीं
दूर दूर तक।
नयनाभिराम है
महज भ्रम।
आंखों में झोंक लिये
धुल के कण।
तात्कालिक लाभ ने
किया है अंधा
स्वार्थपरता
खेलती अस्तित्व से
यह जान के
बनते अनजान
पैसों के लिये
बेच दिया ईमान
वृक्षारोपण
कागज पर धरा
असल धरा
बंजर पड़ रही
सारी योजना
अपूर्ण सड़ रही
ठेके का काम
चंद हस्ताक्षरों से
दे दिया नाम
हरियाली योजना
वृक्षों की कमी
संकट है गहरा ।
पीढ़ियों को खतरा।

✍मनीभाई”नवरत्न”

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