हे नारी- मनीभाई नवरत्न

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हे नारी- मनीभाई नवरत्न

हे नारी- मनीभाई नवरत्न

हे नारी!
तू क्यों शर्मशार है।
समाज से भला क्यों गुहार है?

मत मांग, इससे
कोई दया की भीख ।
वो सब बातें जिनमें
पुरूष का वर्चस्व,
उन सबको तू सीख।
है तुझमें भी अदम्य क्षमता
कम क्यों आंकती, तु खुद को।
इतिहास साक्षी, तेरे कारनामों से ।
मत समेट अपने वजूद को।
चारदीवारी से बाहर आ ,
खुद से मिलने के लिए ।
तू कली !
धूप से ना मुरझा
तैयार हो खिलने के लिए ।
कोई कब तक लड़ेगा ,
तेरी हिस्से की लड़ाई ।
आखिर कब तक चलेगी ,

पीछे-पीछे बन परछाई ।
तुझे अबला जान के ही
तेरा अपमान हुआ है ।
देर ही सही हर युग में,
मगर तेरा सम्मान हुआ है ।
चल एक हो
अन्याय के खिलाफ ।
तेरी बिखराव ही
तेरी दुर्गति का कारण है ।
मत कोस अपने भाग्य को
ये जीवन संघर्ष का रण है।
जब हर तरफ तू
संबल नजर आयेगी ।
ये धरा तेरे कर्मों से
स्वर्ग बन उभर आयेगी ।
मनीभाई”नवरत्न”
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