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हिन्दी कविता: वक्ता पर कविता– नरेन्द्र कुमार कुलमित्र

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वक्ता पर कविता- नरेन्द्र कुमार कुलमित्र

हे मेरे प्यारे वक्ता
वाक कला में प्रवीण
बड़बोला महाराज
बातूनी सरदार
कृपा करके हमें भी बताओ
कि तुम इतना धारा प्रवाह
कैसे बोल लेते हो..?
बिना देखे,बिना रुके
घंटों बोलने की कला
आख़िर तुमने कैसे सीखी है..?
दर्शकों को
गुदगुदाने वाली कविताएँ
जोश भरने वाली शायरियां
और नैतिक उपदेश वाले
संस्कृत के इतने सारे श्लोक
तुमने भला कैसे याद किए हैं..?
मुझे नहीं लगता
कि केवल बोलने लिए
इतना परिश्रम, इतना अभ्यास
सिवाय तुम्हारे
भला कोई और कर सकता है..?

तुम्हारा भाषण सुनकर
मंत्रमुग्ध हो जाती हैं जनता
तुम अपने जादुई शब्दों से
लोगों में बाँध देते हो समा
तुम्हारी सभाओं में
लगातार गूँजती है
तालियों की गड़गड़ाहट
जब तुम ‘भारत माता की जय’
की बुलंद नारे के साथ
अपने भाषण को देते हो विराम
तुम्हारे स्वागत में उठ खड़े होते हैं
मंचासीन सारे लोग
हाथ जोड़कर
करते हैं अभिवादन
सचमुच तुम
इतना अच्छा बोलते हो
कि तुम्हारे लाखों मुरीद बन जाते हैं
अनगिनत दीवाने हो जाते हैं
नवयुवा पीढी
तुम्हारे पदचिन्हों पर
चलने को बड़े बेताब लगते हैं

पर मैंने सुना है
कि गरजने वाले बादल
कभी बरसते नहीं
भौकने वाले कुत्ते
कभी काटते नहीं
तो क्या मान लूं
बोलने वाला बड़बोला वक्ता
कभी कुछ करते ही नहीं..?
वैसे भी
जब करने वाले के पास
बोलने का वक्त नहीं होता
फिर बोलने वाले के पास
कुछ करने का वक्त भला कैसे होगा..?

हे बोलने की संस्कृति
के जन्मदाता
तुम अपनी
वक्तृता क्षमता के कारण
दुनियां में सदा अमर रहोगे
बोलने में ही तुम्हारा पहचान है
तुम बस यूं ही बोलते ही रहो
जब-जब केवल
बोलने वालों की बात होगी
तुम सदैव याद किए जावोगे।

— नरेन्द्र कुमार कुलमित्र
9755852479

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