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होली के रंग हिंदी कविता, आरती सिंह

होली प्रेम और सौहार्द्र का उत्सव है जो कि जीवन के कटु अनुभवों के कारण अंतःकरण में जमे मैल को धोकर उसे स्वच्छ बनाकर, जीवन को सात रंगों में डुबोकर आनंदित कर देती है|

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होली के रंग कविता, आरती सिंह

चैत्र कृष्ण एकम होली धुलेंड़ी वसंतोत्सव Chaitra Krishna Ekam Holi Dhulendi Vasantotsav

लाल रंग हो अधीर,सज्जित होकर अबीर,
निकले हैं आज कंचन काया को सजाने |

हरे-नील रंग चले, लेकर उमंग चले
आज मधुर बेला में सबको रिझाने |

चाहे कोई अमीर होवे या फिर फ़क़ीर
रंग सभी को लगे हैं एक सा रंगाने |

प्रेमी हो, मित्र चाहे, बैरी हो या हो बंधु
रंग सभी को लगे हैं एक कर मिलाने |

आज कोई मूढ़ नहीं, ना कोई सयाना है
एक जैसे चेहरे लगा आईना बताने |

प्रेम रंग डूबे सब, भूल गए ज़ात-पाँत
ईश्वर के पुत्र लगे ईश को मानाने |

कान्हा ने राधा संग, खेले होली के रंग
त्रिभुवन को भक्ति प्रेम रस में डुबाने |

आरती सिंह

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