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हृदय के ताप हरे-सत्यम प्रकाश ‘ऋतुपर्ण’

कविता सांसारिक चक्र के दुःख संकट से घबराकर भागने की अपेक्षा इन सब विपत्तियों को चुनौती की तरह स्वीकार कर कृष्ण के कर्मयोग पथ पर चलने की राह प्रशस्त करती है।

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हृदय के ताप हरे -सत्यम प्रकाश ‘ऋतुपर्ण’

सब मिटे हृदय के ताप हरे!

यह विषमय विस्मय पाप हरे!

सब वेद – वाङ्गमय , तंत्र – मंत्र,
जादू- टोने होने न होने से क्या?
अमोल क्षणिक-माणिक,मुद्रा,मोती
पाने से अथवा खोने से क्या?

जब जीता है संताप हरे,

सब मिटे हृदय के ताप हरे!

जो इस लोक को जीते हैं उनका
नर्क – स्वर्ग मरीचिका भूतल है।
है लंगर डाले पोत ठहरा हुआ दृढ़,
तर्कहीन न सतही जल है।

यह निरा नहीं प्रलाप हरे,

सब मिटे हृदय के ताप हरे!

नहीं तरूंगा वैतरणी में
उस पार रहो तुम;इसी पार रहूँ मैं!
बल दो इतना कि पथ के सारे
आतप-अंधड़ शत-शत बार सहूँ मैं।

रहे कर्मयोग – प्रताप हरे,

सब मिटे हृदय के ताप हरे!

-सत्यम प्रकाश ‘ऋतुपर्ण’

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