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कुछ तो है तेरे मेरे बीच -मनीभाई नवरत्न

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-मनीभाई नवरत्न

कुछ तो है तेरे मेरे बीच -मनीभाई नवरत्न

कुछ तो है 
तेरे मेरे बीच 
जो मैं कह नहीं सकता .
और तुम सुन नहीं सकते.
इस कुछ को खोज रहा हूँ .
जो मिले तुम्हें बता देना.
आखिर तुम कह सकते हो.
और मैं सुन लूँगा.

मैं पूछता मेरे ख्यालों से दिन रात
क्यूँ सिर उठाते हैं देखकर तुम्हें
दिल के सारे जज्बात.
तुम अपने तो नहीं 
ना कभी होगे.
पर गैरों सा ये मन 
तुम्हें अपना लेना चाहता है
जो भी मिला अब तक ज़िन्दगी में
वो सब देना चाहता है.

इसलिए नहीं कि
हासिल करना हैं तुम्हें.
इसीलिए भी नहीं कि,
काबिल हूँ मैं तेरे लिए.
पर फिर भी….

कुछ और सोचूं इस खातिर
बोल उठती है मेरी चेतना.
ठहर जाओ!
इसे रहने दो अनाम .
जो तेरा हो नहीं सकता,
उसे मत करो बदनाम.

पर
कुछ तो है 
तेरे मेरे बीच 
जो मैं कह नहीं सकता .
और तुम सुन नहीं सकते.
लेकिन हाँ ! जी जरुर सकते हैं .

-मनीभाई नवरत्न

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