लघुकथा कैसे लिखें

लघुकथा-विधा हिन्दी गद्य साहित्य की ऐसी विधा है, जिसमें कम से कम शब्दों में एक गहरी बात कहना होता है जिसको पढ़ते ही झटके से पाठक मन चिंतन के लिए उद्वेलित हो जाये।

राजनैतिक, सामाजिक व पारिवारिक परिवेश में सूक्ष्म से सूक्ष्म विसंगतिपूर्ण मानसिकता को चिंहित कर वास्तविकता के धरातल पर तर्कसंगत तथ्यों के सहारे कथ्य को उभार देना ही लघुकथा का उद्देश्य है। अर्थात लघुकथा विसंगतियों को सूक्ष्मता से पकड़ने की चीज़ है। सूक्ष्म कथ्य, एक विसंगतिपूर्ण मानसिकता लघुकथा में उभरकर आना चाहिये।

लघुकथा के लिए विसंगतिपूर्ण मनोदशा का निर्वाह करना होता है।
संस्मरण, चुटकुला, बोधकथा इत्यादि लेखन से इतर लघुकथा गम्भीर बात को लिखने की चीज़ है। विसंगतियों पर तंज कसते हुए समाज में संदेश देने हेतु ही इसको लिखा जाता है।

विसंगतियों को देख कर जब रचनाकार के मन के अंदर कुलबुलाहट बढ़ती है तो वह कलम उठाता है कुछ कहने के लिए। दरअसल मन की उथल पुथल जब पीड़ा के हद तक पहुँचती है तभी रचना साकार होती है। यह इकहरी भाव को कथ्य बनाकर यथार्थ का बोध कराने वाली विधा है।

लघुकथा अपवादों को लिखने की विधा नहीं है। अर्थात कोई असाधारण बात नहीं लिखना है, यानि सत्य-घटना या आँखों-देखी नहीं लिखना है बल्कि यथार्थ-बोध को चिन्हित करती हुई क्षण विशेष को लिखना होता है।
गद्य साहित्य की करीब १६ विधाओं में लघुकथा विधा एक है। सभी विधाओं का अपना एक अनुशासन और निर्वाह होता है ताकि विधा अपनी विशिष्ट पहचान बनाये रखे। उदाहरण स्वरूप दोहा और शेर पद्य विधा के दोनों स्वरूप दो पंक्तियों में ही पूरी बात कहना लेकिन अपने अपने अनुशासन के कारण ही दोनों अलग और स्वतंत्र विधा है। ठीक इसी तरह लघुकथा का अपना एक अलग मिजाज है जो तंजदार है, इसके अंतिम पंक्तियों में ही कथ्य का चरमोत्कर्ष निहित होता है। लघुकथा का अंत ऐसा हो जहाँ से एक नयी चिंतन निकलकर आये और एक नयी लघुकथा की शुरुआत हो सके।

लघुकथा के प्रमुख मानक – तत्व

लघुकथा के प्रमुख मानक – तत्व इस प्रकार है :–
१ – कथानक- प्लॉट , कथ्य को कहने के लिये निर्मित पृष्ठभूमि ।
२- शिल्प – क्षण विशेष को कहने के लिये भावों की संरचना ।
३- पंच अर्थात चरमोत्कर्ष – कथा का अंत ।
४- कथ्य – पंच में से निकला वह संदेश जो चिंतन को जन्म लें ।
५- लघुकथा भूमिका विहीन विधा है।
६- लघुकथा का अंत ऐसा हो जहाँ से एक नई लघुकथा जन्म लें अर्थात पाठकों को चिंतन के लिये उद्वेलित करें।
७- लघुकथा एक विसंगति पूर्ण क्षण विशेष को संदर्भित करें ।
८- लघुकथा कालखंड दोष से मुक्त हो ।
९- लघुकथा बोधकथा ,नीतिकथा ,प्रेरणात्मक शिक्षाप्रद कथा ना हों ।
१०- लघुकथा के आकार -प्रकार पर पैनी नजर ,क्योंकि शब्दों की मितव्ययिता इस विधा की पहली शर्त है ।
११- लघुकथा एकहरी विधा है ।अतः कई भावों व अनेक पात्रों का उलझाव का बोझ नहीं उठा सकती है।
१२- लघुकथा में कथ्य यानि संदेश का होना अत्यंत आवश्यक है।
१३- लघुकथा महज चुटकुला ना हों ।
१४- लेखन शैली
१५- लेखन का सामाजिक महत्व

  • लघुकथा भूमिका विहीन विधा है जिसमें एक विशिष्ट कालखंड में चिन्हित विसंगतिपूर्ण कथ्य का निर्वाह यथार्थ के धरातल पर किया जाता है।
  • लघुकथा में जो भी कहना-सुनना होता है वो पात्रों के माध्यम से ही कहना होता है.
  • कथ्य के आस-पास ही पूरी लघुकथा बुनी होनी चाहिये।
  • लघुकथा एक ही कालखंड यानि एक ही क्षण में यथार्थ के धरातल पर घटित घटना के जरिए कथ्य को कहने की विधा है। ऐसे में जब दो या अधिक कालखंड को पकड़ कर कथ्य कहने की कोशिश की जाती है तो कालखंड दोष आ जाता है। कालखंड दोष के कारण ही एक रचना छोटी होने के बावजूद लघुकथा के बजाय वह कहानी बन जाती है।

laghukathavritt.page से साभार

(Visited 20 times, 1 visits today)

प्रातिक्रिया दे