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चोका: मैं एक पत्ता – मनीभाई नवरत्न

मानव जीवन को एक पत्ते की उपमा देते हुए यह चोका प्रस्तुत है

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*चोका*
मैं एक पत्ता
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ड़ता गया
कभी ना पूछ पाया
तुम मेरे क्या?
बस बहता गया
हर दिशा में
हर मनोदशा में
साथ निभाता
कभी धूल, पत्थर
पंक से सना
बेपरवाह बना
फंसता गया
हां !मैं हंसता गया
जीवन मेरा
अब तू ही अस्तित्व
मैं एक पत्ता
सूखा,निर्जीव, त्यक्ता
साथ जो तेरा
मैं नहीं बेसहारा
हवा के झोंके
ख़ुश्बू से नहला दे।
जी भर बहला दे।
मनीभाई”नवरत्न”
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