KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

मैं उड़ता पतंग मुझे खींचे कोई डोर

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मैं उड़ता पतंग मुझे खींचे कोई डोर

मैं उड़ता पतंग ….मुझे खींचे कोई डोर।
तेरी ही ओर।।
मेरा टूट न जाए धागा।
भागा ….भागा…भागा ….मैं खुद से भागा।
जागा.. जागा….जागा.. कभी सोया कभी जागा ।
कुछ ख्वाहिशें हैं ,कुछ बंदिशें हैं।
पग-पग में देखो साजिशें है ।
जिसने जो चाहा है कब वो पाया है ।
पल पल में तो मुश्किलें है ।
यह किस्मत का कोई धनी ,तो कोई अभागा।
भागा… भागा… भागा.. मैं खुद से भागा ।
जागा …जागा ..जागा. कभी सोया कभी जागा ।
कभी धूप सी तो कभी छांव है ।
जिंदगी खेलें यहां हर दांव है ।
दिल तो चाहे शहर ,पर छूटे ना गांव है।
कशमकश में पड़े यहां मेरे पांव है।
फिर समझा लूं ,तपे सोना ,पाकर सुहागा।
भागा …भागा …भागा …मैं खुद से भागा ।
जागा ..जागा ..जागा ..कभी सोया कभी जागा।।

  • मनीभाई नवरत्न
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