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हिंदी कविता: मेरा दिन छोटा कैसे हो गया? -मनीभाई नवरत्न

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मेरा दिन छोटा कैसे हो गया ?

स्वर व रचना :- मनीभाई नवरत्न

हाय ये वक्त!
मुझे भगाया जा रहा है सरपट ।
उसके हाथ में है लगाम
कैसे छीनूं ,
कोई बताये मुझे?
जो कोई हो आज बेलगाम।।

सेकेन्ड के हिसाब ने,
इसे कीमती बना दिया है;
तभी इतरा रहा है।
चढ़ा दिया है मैंने ही इसे
अपने सर पे।
जैसे कोई बाप,
परवरिश करता हो
इकलौते पुत्र का
अति प्रेमवश ।
फिर टिकते नहीं हैं पैर उसके
दिन भर कभी घर में।

मैंने सपने देखे थे साथ इसके
दो घड़ी ही सही
पर आराम से
कर सकूं बात
बेसिर पैर, फिजूल के।
खेल सकूं ताश- पत्ते- लूडो
थकते तक अनवरत।
कि देखना पड़े मुझे घड़ी ,
और कह सकूँ कि
अभी टाइम बहुत है
चलो, थोड़ी सी झपकी मार लें।

तब भी थे
दिन में चौबीस घंटे
और अब भी
कांटों की गति का पता नहीं ।
चूंकि नहीं की थी पड़ताल।
वरना असलियत जानना
आसान रहता
कि मेरा दिन छोटा कैसे हो गया ?

मैंने अपने सारे वक्त खोये
ताकि थम सकूँ किसी पड़ाव।
गुजार सकूं वक्त
इसी “वक्त” के साथ।
पर भला शहर जाने के बाद
गांव का सरल आदमी
शहरी रंग में
सहज कैसे रह पायेगा ?

वैसे भी आजकल
शहर के साथ
गांव भी भागा जा रहा है ।
भागना हो गया,
विकास का पर्याय ।

विकास मेरे खेलों का ही,
अवरुद्ध हो गया है।
जब से खेल में
होने लगी प्रतियोगिताएं
और बन गया जब से
खेलने वाला
” एक खिलाड़ी ” ।

मुझे ज्ञात हो चला है
गुल्ली डंडा, नदी पहाड़
डंडा पचरंगा के खेल से
मैं हो सकता था
वक्त से बेलगाम ।
पर किसे फुरसत है
यह सोचने की ?

ओह मैं कितना लिखता हूँ
आज इसे कौन सुनेगा-पढ़ेगा?
काल सबको भगा रहा है
उस महाकाल के पास।
वहां सब मिलेंगे
तो सबके पास होगा वक्त।
वहाँ सब खेलेंगे
गुल्ली-डंडा, नदी-पहाड़
डंडा-पचरंगा।
तब सब पढेंगे सुनेंगे यह कविता
अब बस यही उम्मीद बची है।

  • मनीभाई नवरत्न
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