KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

नाप-तोल

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देखा है वो वक़्त ज्ञानी, रुक जाती है जुबानी।
सिल जाते होंठ जहाँ, स्वयं नाप-तोल में।।

रूह से ये मन बोले, आंखों में ना आंखें डोले।
सुनने है शब्द सांझे, बेचैनी माहौल में।।

तेवर की तीव्र होली, अंगारो जैसी रंगोली।
घुल गई धुँआ भी तो, स्नेह के घोल में।।

अभिमानी गई जानी, सब मस्त दाना-पानी।
सीख मैंने सीख लई, प्यार के ही बोल में।।

स्वयं नाप-तोल में जी, स्वयं नाप-तोल में।
स्वयं नाप-तोल में जी, स्वयं नाप-तोल में।।
© महेश कुमार

#SweetFight मनहरी घनाक्षरी छंद में संचित इस कविता को पढ़कर अपने विचार जरूर सांझा करें।

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