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नारा भर हांकत हन (व्यंग्य रचना)

एकर सेती भैया हो , जम्मो मनखे मन,ला मिलजुल के,लालच ला दुरीहा के पर्यावरण बचाए बर कुछ करना
पड़ही। लेकिन ये हा केवल मुंह अउ किताब भर मा तिरिया जाथे।

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नारा भर हांकत हन (व्यंग्य रचना)


पेड़ लगाओ,पेड़ बचाओ ,
खाली नारा भर ला हांकत हन।
अऊ खेत जंगल के रुख राई ला,
चकाचक टांगिया मां काटत हन।

थोकिन रुपिया पईसा के लालच मा,
सउघा रुख राई ला काट डरेन।
दाई ददा बरोबर जियइया रुख ला,
जीते जी मार डरेन।

पर्यावरण बचाना हे,कहीके
नारा ला कांख कांख के हांकत हन।
नरवा, कुआं,नदिया,तरिया,ला,
बिकास के धुन मा पाटत हन।

विकास के चक्कर मा, मनखे मन,
पहाड़ अऊ जंगल ला काटत हन।
प्रकृति ला बेच के जम्मों,
धन दौलत ला बांटत हन।

प्रकृति से झन खिलवाड़ करव,
ये हमर महतारी आय।
जम्मो जीव जंतु मनखे के,
सुग्घर पालनहारी आय।

प्रकृति महतारी खिसियाही जब
भयंकर परलय लाही।
मनखे जीव सकल परानी,
धरती घलो नई बच पाही।

जम्मो मनखे मन मिलके,
पर्यावरण ला बचाबो।
अवईया पीढ़ी बर हमन ,
ये धरती ला सुग्घर बनाबो।

✍️रचना –महदीप जंघेल

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4 Comments
  1. Mahdeep Janghel says

    धन्यवाद जी

  2. R j says

    शानदार और सत्यता पर आधारित कविता है। बहुत ही अच्छा

  3. Mahdeep Janghel says

    धन्यवाद

  4. Priyanka janghel says

    आज की सत्यता है भैया यही तो
    👌👌👌👌 आपकी रचना बहुत ही जबरदस्त है