KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

नारी हूँ पर कब तक मै पीर सहूं

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नारी हूँ पर कब तक मै पीर सहूं

Naari
नारी चेतना

नारी हूँ कोई वस्तु नहीं कब तक मै पीर सहूं।
कब तक मैं खामोश रहूँ,कब तक………
बेटियों की इज्जत लुटना,रोज रोज की बात,
रावण दुशासन बैठेअब दरबार लगाके घात।
फाँसी ही सजा इन्हें हो,कब तक हालात सहूं
कब तक मैं खामोश रहूँ,कब तक……….
सात वर्ष की बेटी को,हवस के शिकार बनाते
भूखे भेड़िये मासूमों को,क्यों इतना तड़पाते।
लहूलुहान हो रही बेटियाँ माँहूँ कैसे पीर सहूं
कब तक मैं खामोश रहूँ,कब तक….
बीच सभा में चीर हरण,चुप थे भीष्म,धृतराष्ट्र
पंचपति बैठे थे मौन,द्रौपदी करते रही पुकार
नहीं द्रोपदी आज की नारी,
क्यों कर मैं ये जुल्म सहूं।
कब तक मैं खामोश रहूँ,कब तक…..
रघुवर के संग वन वन ड़ोली
पत्नी व्रत धर्म निभाती।
सुख दुख की बनी संगिनी,
पिय संग हँसती गाती।
धोबी के उलाहने मात्र से,
वापस क्यूँ वनवास सहूं।
कब तक मैं खामोश रहूँ…कब तक…..
मीरा थी प्रेम दीवानी,कृष्ण प्रेम में जीती थी
राणा के हाथों से,जहर का प्याला पीती थी
हूँ कान्हा की प्रेम दीवानी,
मैं क्योंकर विषपान करूँ।
कब तक मैं खामोश रहूँ…..कब तक…..
मैं रानी,झाँसी वाली,बलिदानों की बात कहूँ
बाँधपीठ निजपुत्र,समरक्षेत्र में कूद पड़ूं
आज नारियाँ अंबर को नापे,
क्यूँ जौहर की बात कहूँ।
कब तक मैं खामोश रहूँ….कब तक…
बहन बेटियों की इज्जत को,
तार तार नर जो करता है।
अपनी माँ के कोख को वह,
खुद बदनाम वो करता है।
सरे राह जलवाऊँ उनको,
क्यों कर यह दुष्कृत्य सहूं।
कब तक मैं खामोश रहूँ, कब तक……..
केवरा यदु “मीरा”
कविता बहार से जुड़ने के लिये धन्यवाद

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