कविता बहार

"कविता बहार" हिंदी कविता का लिखित संग्रह [ Collection of Hindi poems] है। जिसे भावी पीढ़ियों के लिए अमूल्य निधि के रूप में संजोया जा रहा है। कवियों के नाम, प्रतिष्ठा बनाये रखने के लिए कविता बहार प्रतिबद्ध है।

गज़ल-मौत का क्या है

हिंदी कविता

गज़ल-मौत का क्या है मौत का क्या है कभी तो आ ही जाएगी,,,हयात का क्या है कभी तो खत्म हो ही जाएगी,, सोचते रहते हैं हम तो उनके बारे में,,,इंतजार की घड़ी कभी तो खत्म हो ही जाएगी,, अंधेरा ही नज़र आता है हर तरफ,,,आसमां की रात कभी तो खत्म हो ही जाएगी,,, “सुखवीर” से […]

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बसन्त ऋतु पर गीत

हिंदी कविता

बसन्त ऋतु पर गीत लगे सुहाना मौसम कितना,मन तो है मतवाला।देख बसन्त खिले कानन में,फूलों की ले माला।। शीतलता अहसास लिए हैं,चलते मन्द पवन हैं।ऋतु बसन्त घर आँगन महके,जलते विरही मन हैं।।पंछी चहके हैं डाली पर,गाते गीत निराला।।लगे सुहाना………………………… ढाँक पलास खिले तरुवर पर,अनुपम छटा बिखेरे।सरिता की पावन जल धारा,कल-कल करती फेरे।।भँवरे गुन-गुन गाते मधुरिम,पी

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साधना पर कविता

हिंदी कविता

साधना पर कविता करूँ इष्ट की साधना,कृपा करें जगदीश।पग पग पर उन्नति मिले,तुझे झुकाऊँ शीश।। योगी करते साधना,ध्यान मगन से लिप्त।बनते ज्ञानी योग से,दूर सभी अभिशिप्त ।। जो मन को हैं साधते,श्रेष्ठ उसे तू जान।दुनिया के भव जाल में,फँसे नहीं वो मान।। करो कठिन तुम साधना,दृढ़ता से धर ध्यान।मन सुंदर पावन बने,संग मिले सम्मान।। मानव

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मनोरम छंद विधान- बाबूलाल शर्मा

हिंदी कविता

मनोरम छंद विधान मापनी – २१२२ २१२२ चार चरण का छंद है दो दो चरण सम तुकांत हो चरणांत में ,२२,या २११ हो चरणारंभ गुरु से अनिवार्य है ३,१०वीं मात्रा लघु अनिवार्य मापनी – २१२२, २१२२ कल काल से संग्राम ठानो!साहसी की जीत मानो!आज आओ मीत सारे!काल-कल बातें विचारे! सोच ऊँची बात मानव!भाव होवें मान

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महँगाई पर दोहे

हिंदी कविता

महँगाई पर दोहे महँगाई की मार से , हर जन है बेहाल।निर्धनभूखा सो रहा,मिले न रोटी दाल।।1।। महँगाई डसती सदा,निर्धन को दिनरात।पैसा जिसके पास है,होती उसकी बात।।2।। महँगाई में हो गया , गीला आटा दाल।पूँछे कौन गरीब को,जिसका है बेहाल।।3।। सुरसा के मुख सी बढ़े,महँगाई की मार।देखो तो चारों तरफ , होता हाहाकार।।4।। महँगी हर

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ऋतुराज बसंत पर दोहे

प्रकृति और पर्यावरण

ऋतुराज बसंत पर दोहे धरती दुल्हन सी सजी,आया है ऋतुराज।पीली सरसों खेत में,हो बसंत आगाज।।1।। कोकिल मीठा गा रही,भांतिभांति के राग।फूट रही नव कोंपलें , हरे भरे हैं बाग।।2।। पीली चादर ओढ़ के, लगती धरा अनूप।प्यारा लगे बसंत में, कुदरत का ये रूप।।3।। हरियाली हर ओर है , लगे आम में बौर।हुआ शीतअवसान है,ऋतु बसंत

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संवेदना पर कविता -अमित दवे

हिंदी कविता

संवेदना पर कविता कथित संवेदनाओं के ठेकेदारों कोसंवेदनाओं पर चर्चा करते देखा। संवेदनाओं के ही नाम पर संवेदनाओं काकतल सरेआम होते देखा।। साथियों के ही कष्टों की दुआ माँगतेसज्जनों को शिखर चढते देखा।। खेलों की बिसातों पे षड्यंत्रों सेअपना बन जग को छलते देखा।। वाह रे मेरे हमदर्दों हमदर्दी की आड मेंतुमको क्या क्या न

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गुरू पर कुण्डलियां -मदन सिंह शेखावत

हिंदी कविता

महर्षि वेद व्यासजी का जन्म आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा को ही हुआ था, इसलिए भारत के सब लोग इस पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाते हैं। जैसे ज्ञान सागर के रचयिता व्यास जी जैसे विद्वान् और ज्ञानी कहाँ मिलते हैं। व्यास जी ने उस युग में इन पवित्र वेदों की रचना की जब शिक्षा

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विरह पर दोहे -बाबू लाल शर्मा

नारी जीवन और संवेदना

विरह पर दोहे सूरज उत्तर पथ चले,शीत कोप हो अंत।पात पके पीले पड़े, आया मान बसंत।। फसल सुनहरी हो रही, उपजे कीट अनंत।नव पल्लव सौगात से,स्वागत प्रीत बसंत।। बाट निहारे नित्य ही, अब तो आवै कंत।कोयल सी कूजे निशा,ज्यों ऋतुराज बसंत।। वस्त्र हीन तरुवर खड़े,जैसे तपसी संत।कामदेव सर बींधते,मन मदमस्त बसंत।। मौसम ले अंगड़ाइयाँ,दामिनि गूँजि

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mahatma gandhi

गाँधीजी पर कविता – बाबू लाल शर्मा

हिंदी कविता

गाँधीजी पर कविता भारत ने थी ली पहन, गुलामियत जंजीर।थी अंग्रेज़ी क्रूरता, मरे वतन के वीर।हाल हुए बेहाल जब, कुचले जन आक्रोश।देख दशा व्याकुल हुए, गाँधी वर मतिधीर। काले पानी की सजा, फाँसी हाँसी खेल।गोली गाली साथ ही , भर देते थे जेल।देशी राजा अधिक तर, मौज करे मदमस्त।गाँधी ने आवाज दी, कर खादी से

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बसंत पंचमी पर कविता

हिंदी कविता

बसंत पंचमी पर कविता मदमस्त    चमन अलमस्त  पवन मिल रहे  हैं देखो, पाकर  सूनापन। उड़ता है सौरभ, बिखरता पराग। रंग बिरंगा सजे मनहर ये बाग। लोभी ये मधुकर फूलों पे है नजर गीला कर चाहता निज शुष्क अधर। सजती है धरती निर्मल है आकाश। पंछी का कलरव, अब बसंत पास।

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बीते समय पर कविता

समय और जीवन दर्शन, हिंदी कविता

बीते समय पर कविता हम रहो के राही हैभटक जाए इतना आसान नहींइतना रहो में गुमार नहीहम से टकरा जाए इतना हकूमत में साहस नहीहो जाता हैचिर हरण जैसे जब अपने घर ही ताक नहीअपने बच्चे ही हाथ नहीदुनिया में खूब कमाई दौलतपर करता रहा में कोई राम राम नहीचलना आता हैपर करता है जमाना

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