कविता बहार

"कविता बहार" हिंदी कविता का लिखित संग्रह [ Collection of Hindi poems] है। जिसे भावी पीढ़ियों के लिए अमूल्य निधि के रूप में संजोया जा रहा है। कवियों के नाम, प्रतिष्ठा बनाये रखने के लिए कविता बहार प्रतिबद्ध है।

पशु-पक्षियों की करुण पुकार

हिंदी कविता

पशु-पक्षी हमारे मित्र होते है। उन्हें प्यार,दुलार देना एवं उनकी सुरक्षा हमारी जिम्मेदारी है । लेकिन हम मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए उन्हें मार देते है।हमे ये नही भूलना चाहिए कि पर्यावरण का संतुलन बनाने में उनका अहम योगदान होता है।यदि उनकी क्षति होती है ,तो हम भी नही बच पाएंगे। इस कविता के माध्यम से मूक प्राणियों की करुण पुकार है।

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छत्तीसगढ़ शासकीय भवनों के नाम

हिंदी कविता

छत्तीसगढ़ शासकीय भवनों के नाम ये नाम छत्तीसगढ़ी हरे हैं ।है स्वाद मीठे रस से भरे हैं ।।जानो सभा आज विधान के हैं ।देवी ” मिनीमातु ” सियान से हैं ।। अध्यक्ष के धाम बने सियासी ।” संवेदना ” है गृह के निवासी ।।ये गेह मंत्रालय हैं सुहाते ।आमोद ” कल्याण निवास ” भाते ।।

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1मार्च शून्य भेदभाव दिवस पर कविता

1मार्च शून्य भेदभाव दिवस पर कविता / मनीभाई नवरत्न

महत्वपूर्ण दिन आधारित कविता, हिंदी कविता,

1मार्च शून्य भेदभाव दिवस पर कविता / मनीभाई नवरत्न शून्य भेदभाव दिवस पर, हम एक हो जाएँ ,पूरा विश्व एकजुट, सुबह के सूरज के नीचे।करते हैं आवाज़ बुलंद और स्पष्ट ,नफ़रत को और न कहने के लिए, भय को दूर करने के लिए। हम सब एक जैसे हैं, त्वचा के नीचे खून से कोई जाति

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छत्तीसगढ़ कविता

कविता : छत्तीसगढ़ के धरना का इतिहास पर चौपाई / आशा आज़ाद

नारी जीवन और संवेदना

कविता : छत्तीसगढ़ के धरना का इतिहास पर चौपाई / आशा आज़ाद  सन् 1995 से पृथक राज्य अखंड धरना आंदोलन प्रारंभ  आज सुनाऊँ सुनलो गाथा।सुनकर झुक जाता है माथा। राज्य पृथक जो आज कहाया।धरना आदोंलन से आया।। नौ अप्रैल की घटना जाने।सन उन्नीस पंचानवे माने। दशम दिसंबर हुआ समापन। हुए प्रफुल्लित मानब जन जन।। धरना

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JALATI DHARATI

जलती धरती / भावना मोहन विधानी

हिंदी कविता

जलती धरती / भावना मोहन विधानी वृक्ष होते हैं धरती का सुंदर गहना,हरियाली के रूप में धरा ने इसे पहनाहरे भरे वृक्षों को काट दिया मनुष्य ने,मनुष्य की क्रूरता का क्या कहना?तेज गर्मी से जलती जा रही धरती,अंदर ही अंदर वह आहे हैं भरती,कौन सुनेगा अब पुकार उसकीमनुष्य जाति उसके लिए कुछ नहीं करती।पेड़ों को

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जलती धरती/चन्दा डांगी

हिंदी कविता

जलती धरती/चन्दा डांगी बचपन मे हमने देखीहर पहाड़ी हरी भरी नज़र आता नही पत्थर कोई वहाँकटते गये जब पेड़ धरती होने लगी नग्न सिलसिला ये चलता रहाअब पत्थर नज़र आतेपेड़ो का पता नहींलाते थे हम सामान कपड़े की थैलियों मे अब पाॅलीथीन से ये धरती पटी पड़ी नल नहीं थे घरों मे पानी का मोल

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जलती धरती /हरि प्रकाश गुप्ता सरल

प्रकृति और पर्यावरण

जलती धरती /हरि प्रकाश गुप्ता सरल धरती जलती है तो जलने दीजिए।पेड़ कटते हैं तो कटने दीजिए।।भले ही जल जाए सभी कुछ यहांपर पर्यावरण की न चिंता कीजिए।कुछ तो रहम करो भविष्य के बारे में अपने लिए न सही आगे की सोचिए।।न रहेंगे जंगल और न रहेगी शीतलताहरियाली धरा में न दिख पाएगी।न कुछ फिर

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जलती धरती/शिव शंकर पाण्डेय

हिंदी कविता

जलती धरती/शिव शंकर पाण्डेय न आग के अंगार से न सूरज के ताप से।।धरा जल रही है, पाखंडियों के  पाप से।।सृष्टि वृष्टि जल जीवन सूरज।नार नदी वन पर्वत सूरज।।सूरज आशा सूरज श्वांसा।सूर्य बिना सब खत्म तमाशा।सूर्य रश्मि से सिंचित भू हम जला रहे हैं   खुद  आपसे।धरा जल रही है पाखंडियों के पाप से।।सूरज ही मेरी

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पर्यावरण दिवस पर कविता

धरती माता /डा. राजेश तिवारी

हिंदी कविता

धरती माता /डा. राजेश तिवारी धरती मेरी माँ है इसको स्वस्थ और स्वच्छ बनायें ।आओ इसकी रक्षा और सुरक्षा का दायित्व उठायें ।।………………………………………………………. अवैध और अनैतिकता से इसका खनन जो करते ।सोचो इसको दिये घाव जो  कहो वो  कैसे भरते ।।इनको हरी भरी रखना है ये रोमावली है वृक्ष लतायें । मृदा प्रदूषति न करना

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जलती धरती/नीरज अग्रवाल

समाज और यथार्थ

जलती धरती/नीरज अग्रवाल पर्यावरण और वन उपवन हैं।जल थल जंगल हमारे जीवन हैं।जलती धरती बढ़ता तापमान हैं।मानव जीवन में आज  संकट  हैं।हम सभी को सहयोग जो करना हैं।जलती धरती तपता सूरज कहता हैं।वसुंधरा को हरा भरा हमको करना हैं।मानव जीवन में कुदरत के रंग भरने हैंं।आज  हम सभी को प्राकृतिक बनना हैं।न सोचो कल का

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जलती धरती/नीरज अग्रवाल

समाज और यथार्थ

जलती धरती/नीरज अग्रवाल सच तो यही जिंदगी कुदरत हैं।जलती धरती आकाश गगन हैं।हम सभी की सोच समझ हैं।हां जलती धरती  सूरज संग हैं।खेल हमारे मन भावों में रहते हैं।जलती धरतीं मानव जीवन हैं।हमारे मन भावों में प्रकृति बसी हैं।सच और सोच हमारी अपनी हैं।हम सभी जलती धरती के संग हैं।आज कल बरसों से हम जीते

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पर्यावरण दिवस पर कविता

वृक्ष लगाएं धरती बचाये/नीलम त्यागी ‘नील’

हिंदी कविता

वृक्ष लगाएं धरती बचाये/नीलम त्यागी ‘नील’ आओ मिलकर पेड़ लगाएं…इस धरा को वसुंधरा बनाये…एक वन हम ऐसा सजाये…जिससे सारे रोग कट जाएं… प्रदूषण को ऐसी मार लगाएं…आओ एक वृक्ष सभी लगाएं…एक एक करके सभी उपवन बनाये…मानव से ज्यादा हम वृक्ष लगाएं… इस धरा को हम सभी बचाये…जल और पेड़ का महत्त्व बताएं..जीवन अपना उपयोगी बनाएं..महानता

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