KAVITA BAHAR
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है भास्कर तेरी प्रथम किरण

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है भास्कर तेरी प्रथम किरण

है भास्कर तेरी प्रथम किरण,
जब वर्ष नया प्रारम्भ करे।
जन जन की पीड़ा तिरोहित कर,
नव खुशियो को प्रारम्भ करे।
इस धरती,धरा, भू,धरणी पर,
मानवता का श्रृंगार झरे।
अब विनयशील हो प्राणी यहाँ,
बस भस्म तू सबका दम्भ करे।
है भास्कर तेरी……..

तेरा-मेरा,मेरा-तेरा सब,
त्याग के नव निर्माण करे।
आपस में ऐसा समन्वय हो,
मिल सृष्टि का कल्याण करे।
उत्पात,उपद्रव,झगड़ो का,
क्या मोल है ये आभास रहे।
भाईचारे का कर विकास,
हर धर्म का हम परित्राण करे।
है भास्कर तेरी…..

अब देख मनुज की पीड़ा को,
आँखों में नीर निरन्तर हो।
दुःख दर्द सभी का साझा रहे,
मानवता अंत अनन्तर हो।
उत्तुंग शिखर पर संस्कृतियां,
गाएं केवल भारत माँ को।
निज देश हित बलि प्राणों की,
प्रणनम्य, जन्म जन्मान्तर हो।

जब जब भी धर्म ध्वजा फहरे,
तिरंगा वहाँ अनिवार्य रहे।
उद्घोषित कोम का नारा जहाँ,
जय हिन्द सदा स्वीकार्य रहें।
गीता,कुरान,गुरु ग्रंथ साहब,
बाइबिल के रस की धार बहे।
सब माने अपने धर्म यहाँ,
पर भारत माँ शिरोधार्य रहें।

हर पल हर क्षण जननी का हो,
हर भोंर रम्य,अभिराम रहे।
सुरलोक स्वर्ग धरा पर हो,
मनभावन नित्य जहाँन रहे।
माँ भारती जग में हो विख्यात,
ब्रम्हांड ही हिंदुस्तान बने।
मन में सबके वन्दे मातरम् ,
और मुख से जन गण गान रहे।

   विपिन वत्सल शर्मा
       सागवाडा(राज.)

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