प्यार पर कविता / वेलेंटाइन दिवस पर कविता

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प्यार पर कविता / वेलेंटाइन दिवस पर कविता

प्यार पर कविता

प्रेम

प्यार है जीवन का आधार

एक सत्य जीवन का, प्रेम जीवन का आधार।
स्नेह प्रेम की भाषा समझे, ये सारा संसार ।

एक उत्तम फूल धरा पर, जो खिल सकता,वो है प्रेम का फूल।
मानव हृदय में प्रस्फुटित होता, प्रेम में क्षमा हो जाती हर भूल।

प्रेम पूर्णिमा के चांदनी जैसी, करती शीतलता प्रदान।
कभी सूर्य की किरणों सम, तेज ताप कर देती महान।

प्रेम में सहनशीलता ,प्रेम में समर्पण का भाव।
प्रेम पिता का प्यार है ,औैर प्रेम ममता की छांव ।

प्रेम के फूल से महक सकता है, ये सारा संसार।
प्रेम मिटाए नफरत को औैर मिटाए बैर की दीवार।

मानव मानसिकता में परिवर्तन, प्रेम से ही संभव है।
मानवता का आधार प्रेम है, जहां प्रेम वहां मानव है।

प्रेम परोपकार भाव से,मानवता की ओर ले जाए।
पाशविक वृत्ति से दूर निकाले , सच्चा मानव हमें बनाए।

अतिशयोक्ति नहीं है ये सब , पूर्ण सत्य है प्यार।
प्रेम ही तो होता है , हम सब का जीवन आधार ।

इश्क समर्पण पर कविता

मन मयूरा थिरकता है
संग तेरे प्रियतम
ढूंढता है हर गली
हर मोड़ पर प्रियतम

फूल संग इतराएं कलियां
भौंरे की गुनगुन
मन की वीणा पर बजे बस
तेरी धुन प्रियतम

सज के आया चांद नभ में
तारों की रुनझुन
मै निहारूं चांद में बस
तेरी छवि प्रियतम

क्षितिज में वो लाल सूरज
किरने हैं मद्धम
दूर है कितना वो
कितने पास तुम प्रियतम

बरसे सावन की घटा जब
छा के अम्बर पर
छलकती हैं मेरी अंखियां
तेरे बिन प्रियतम

ताप भीषण हो गया तम
उमड़े काले घन
दाह लगाए बिरहा तेरी
मुझको ओ प्रियतम

उमड़ पहाड़ों से ये नदिया
चली झूम कलकल
तुमसे मिलने के जुनून में
जैसे मैं प्रियतम

पल्लवों पर शबनम, किरने
थिरके झिलमिल कर
मेरे अश्कों में छलकते
तुम मेरे प्रियतम

लीन तपस्या में कोई मुनि
अर्पित करता है तनमन
करूं समर्पण तप सारा
तुम पर मेरे प्रियतम।।

शची श्रीवास्तव

इश्क बिना जीवन में रस नहीं

प्रेम बिना जीवन में रस नहीं।
प्रेम करना पर अपने बस में नहीं।
किसी की आंखों में खो जाता है।
बस ऐसे ही प्रेम हो जाता है।

रहता नहीं खुद पर जोर।
मन भागता है हर ओर।
पर मिल जाता है मन का मीत
तब हो जाती है उससे प्रीत।

लिखते प्रेमी उस पर कविता
मन रहता जिस पर रीता।
हृदय बहती प्रेम की सरिता।
मन की रेखा से प्रेम पत्र लिख जाते ।

कितने प्रेम ग्रंथ लिख जाते,
पाकर प्रीतम की एक छवि।
जैसे ईश्वर को बिन देखे भी
उनके चित्र बनाते कलाकार। होकर भक्ति में लीन वैसे ही प्रेमी

बनाते हृदय अपने प्रिय की तस्वीर
कल्पनाओं को करते साकार। पूजते प्रिय को ईश के समान ।
इसी लिए कहते जग में सारे । दिल है मंदिर प्रेम है इबादत।

सरिता सिंह गोरखपुर उत्तर प्रदेश

उसके नखरे सहे हजार

वह खुश रहती मेरे साथ,
और करती है मुझसे बात।
उसके लिए मैं प्यारा,
मुझको वो प्यारी।
उसकी सूरत इस ,
संसार में सबसे न्यारी।
आज वो करने लगी,
मुझसे जान से ज्यादा प्यार।
क्योंकि मैंने ही अकेले,
उसके नखरे सहे हजार।

मेरे लिए वो सजती-संवरती,
फिर मेरे करीब आती है।
धीरे से मेरे अधरों पर,
चुम्बन वो कर जाती है।
आज भी मेरे लिए वो,
होकर आती है तैयार।
क्योंकि मैंने ही अकेले,
उसके नखरे सहे हजार।।

कवि विशाल श्रीवास्तव फर्रूखाबादी।

प्रेम ही जीवन है

हे प्रिय मैं तुमसे कुछ कहता हूँ
हाँ आज फिर कुछ लिखता हूँ
हाँ आज फिर कुछ लिखता हूँ।
एक तड़प रहती है मिलन की
तो एक तड़प रहती है जुदाई की
दोनों के बीच में मैं पिसता हूँ
हाँ आज फिर कुछ लिखता हूँ।


तुम हो तो जीवन है
तुम हो तो है रवानी
तुम हो तो प्यार है
तुम हो तो है जिंदगानी
तुमसे हर दिन हमारा वैलेनटाइन है
है हर साँस तुम्हारा हमारा
तुम हमारे दिल में हो
उम्मीद करू कि मैं भी तुम्हारे दिल में रहता हूं
हां आज फिर कुछ लिखता हूँ।


हर दिन अपना वसन्त हो
हर रात हो अपनी होली
हर नर नारी के दिल में एक ऐसी आग हो
जो वतन के लिए खेल दें खूनों की होली
हे प्रिय मैं हर देशवासी को ये संदेशा कहता हूँ
हाँ मैं आज फिर कुछ लिखता हूँ ।।

पवन मिश्र

कविता के बहाने

आ गया हूं मैं तेरे पास,
अपना गीत गुनगुनाने।
प्रेमी हूं मैं ,
प्रेम की कविता सुनाने।
कहना है आई लव यू,
कविता के बहाने।

तेरे बिन सूनी है,
मेरी ये जवानी।
कैसे बढ़ेगी आगे,
तेरी मेरी कहानी।
अब तो चल साथ मेरे,
आया हूं मैं बुलाने।
कहना है आई लव यू,
कविता के बहाने।

ह्रदय की धड़कन बढ़ रही है,
तेरी सूरत मेरी आंखों में चढ़ रही है।
मैंने खत तेरे लिए जो भेजा,
आज वही आज तू पढ़ रही है।
आया हूं मैं तेरे प्रति,
अपना प्रेम जताने।
कहना है आई लव यू,
कविता के बहाने।।

कवि विशाल श्रीवास्तव फर्रूखाबादी

जो मेरे द्वारे तू आए

प्राण मरुस्थल खिल-खिल जाए
साँस-डाल भी हिल-हिल गाए
छोड़ झरोखे राज महल के
जो मेरे द्वारे तू आए ।

जुड़े सभा सपनों की आकर
आंखों की सूनी जाजम पर
खेल न पाएँ बूँदें खारी
पलकों की अरुणिम चादर पर

चहल-पहल हो मेलों जैसी
गुमसुम अधरों पर गीतों की
फुल उदासी झड़े धूल-सी
खिले जवानी नभ दीपों-सी

उमर चाल छिपते सूरज-सी
घबराकर पीली पड़ जाए ।
छोड़ झरोखे राज महल के
जो मेरे द्वारे तू आए ।

शुष्क मरुस्थल-सी सूखी देह से
फूट पड़ें अमृत के धारे
दीपदान करने को दौड़ें
खुशियाँ मुझे जिया के द्वारे

संगीतमयी संध्या-सी हों
डूबी-सी धड़कन की रातें
मानस की चौपाई जैसे
महकें अलसायी-सी बातें

झरे मालती रोम-रोम से
कस्तूरी गंध बदन छाए
छोड़ झरोखे राज महल के
जो मेरे द्वारे तू आए ।

उतर चाँदनी नील गगन से
पूरे चौका मन आँगन में
चुनचुन मोती जड़ें रातभर
सितारे फकीरी दामन में

थपकी दे अरमान उनींदे
अंक सुलाए रजनीगंधा
भर-भर प्याली स्वपन सुधा की
चितवन से छलकाए चंपा

भोर भए पंछी-बिस्मिल्लाह
शहनाई ले रस बरसाए ।
छोड़ झरोखे राज महल के
जो मेरे द्वारे तू आए ।

अशोक दीप

प्रेम सबको होता है

प्रेम सबको होता है,
प्रेम सबको होता है।


यह लड़की को होता है,
यह लड़के को होता है।
प्रेम सबको होता है,
प्रेम सबको होता है।


किसी को कम होता है,
किसी को ज्यादा होता है।
प्रेम सबको होता है,
प्रेम सबको होता है।


कोई मुझसे कहे न ये,
प्रेम हमको न होता है।
प्रेम सबको होता है,
प्रेम सबको होता है।


किसी को इंसान से होता है,
किसी को भगवान से होता है।
किसी को शिक्षक से होता है,
किसी को शिक्षा से होता है।
प्रेम सबको होता है,
प्रेम सबको होता है।


प्रेम जिसको न होता है,
वो सारी उम्र रोता है।
प्रेम न करने वाला ही,
अपना सबकुछ खोता है।
प्रेम सबको होता है,
प्रेम सबको होता है।

प्रेम अमर रत्न की

प्रेम अमर रत्न की ,
वो एक मुस्कुराहट है ,
जिस रत्न से हम सराबोर है ,
नभ की अभिकल्पनाओं में ,
जीवन तरंगित हुआ ,

मन पुलकित हुआ ,
मन द्रुम्लित हुआ ,
नेह नयनों की आभा ,
प्यार के फुल मे ,
दिल विस्मित हुआ !

निकिता कुमारी

कुछ तो है तेरे मेरे बीच

कुछ तो है 
तेरे मेरे बीच 
जो मैं कह नहीं सकता .
और तुम सुन नहीं सकते.
इस कुछ को खोज रहा हूँ .
जो मिले तुम्हें बता देना.
आखिर तुम कह सकते हो.
और मैं सुन लूँगा.

मैं पूछता मेरे ख्यालों से दिन रात
क्यूँ सिर उठाते हैं देखकर तुम्हें
दिल के सारे जज्बात.
तुम अपने तो नहीं 
ना कभी होगे.
पर गैरों सा ये मन 
तुम्हें अपना लेना चाहता है
जो भी मिला अब तक ज़िन्दगी में
वो सब देना चाहता है.

इसलिए नहीं कि
हासिल करना हैं तुम्हें.
इसीलिए भी नहीं कि,
काबिल हूँ मैं तेरे लिए.
पर फिर भी….

कुछ और सोचूं इस खातिर
बोल उठती है मेरी चेतना.
ठहर जाओ!
इसे रहने दो अनाम .
जो तेरा हो नहीं सकता,
उसे मत करो बदनाम.

पर
कुछ तो है 
तेरे मेरे बीच 
जो मैं कह नहीं सकता .
और तुम सुन नहीं सकते.
लेकिन हाँ ! जी जरुर सकते हैं .

-मनीभाई नवरत्न

सबको चांद का दीदार चाहिए…

मुझे तो मेरा चांद पास मिला है।
ये वो  नहीं जो आसमान का है…
ये नक्षत्र तो मेरे दिल में खिला है।
तू चांद देख जानम..और अपना व्रत तोड़ ले।
मैं ना छोड़ूँ  ये व्रत , चाहे सारा जग छोड़ दे।
तेरे साथ रहना माहिया
बस यही कहना माहिया
तेरे साथ रहना..।
तेरे संग चलना माहिया
बस यही कहना माहिया
तेरे साथ रहना..।
इस दुपट्टे की लाल में प्यार की गहराई है।
माथे के सिन्दूरी में  यादों की शहनाई है।
गले में ये मंगलसूत्र रिश्तों की पूजा है।
तुमसे बढ़के मेरा यहाँ कोई ना दूजा है ।
मैं ना बिकूंगा तुझे चोट देने के लिए
कोई मुझे चाहे लाख करोड़ दें।
मैं ना छोड़ूँ ये व्रत , चाहे सारा जग छोड़ दे।
तेरे साथ रहना माहिया
बस यही कहना माहिया
तेरे साथ रहना..।
तेरे संग चलना माहिया
बस यही कहना माहिया
तेरे साथ रहना..।
शाम की इन हवाओं में रंगीनी छाई है।
जैसे समां ने खुशी से मेंहदी रचाई  है।
हर पति खुशकिस्मत है चेहरे में साज है।
आज अपने पत्नी पे उसे गर्व और नाज़ है।
करवाचौथ का त्यौहार हम सबके लिये
रिश्तों में खुशहाली मोड़ दें।
मैं ना छोड़ूँ  ये व्रत , चाहे सारा जग छोड़ दे।
तेरे साथ रहना माहिया
बस यही कहना माहिया
तेरे साथ रहना..।
तेरे संग चलना माहिया
बस यही कहना माहिया
तेरे साथ रहना..।

प्रेम पत्र पर कविता

पत्र लिख लिख के फाड़े
भू को अम्बर भेज न पाए।
भेद मिला यह मेघ श्याम को
ओस कणों ने तरु बहकाए।।

मौन प्रीत मुखरित कब होती
धरती का मन अम्बर जाने
पावस की वर्षा में जन मन
दादुर की भाषा पहचाने

मोर नाचते संग मोरनी
पपिहा हर तरुवर पर गाए।
प्रेम पत्र ……………….।।

तरुवर ने संदेशे भेजे
बूढ़े पीले पत्तों संगत
पुरवाई मधुमास बुलाए
चाहत फूल कली की पंगत

ऋतु बसंत ने बीन बजाई
कोयल प्रेम गीत दुहराये।
प्रेम पत्र………………..।।

शशि के पत्र चंद्रिका लाई
सागर जल मिलने को मचला
लहर लहर में यौवन छाया
ज्वार उठा जल मिलने उछला

अनपाए पत्रों को पढ़ कर
धरती का कण कण हरषाया।
प्रेम पत्र…………………….।।

बाबू लाल शर्मा *विज्ञ*

वेलेन्टाइन डे की कहानी”

दिन,महिना,साल भूल के,
अब मंथ,ईयर व डे हैं कहाये जाते ।
साल के तीन सौ पैंसठ दिन में,
कुछ न कुछ डे तो मनाये जाते ॥
इन्हीं डे में वेलेन्टाइन डे,
जो प्रेमी जोडे़ हैं मनाया करते ।
इस दिन सब कुछ भुल-भाल के,
बस प्यार का पाठ पढ़ाया करते ॥
जिस किसी को प्यार किसी से,
वो इजहार प्यार का किया करते ।
इक-दूजे को भेंट मे कुछ तो,
प्यार का उपहार दिया करते ॥
वेलेंटाइन डे की भी कहानी मित्रों,
अपनी जुबा से सुनाता हूं ।
सेंट वेलेंटाइन डे का किस्सा,
जो सुना है मै दुहराता हूं ॥
रोम देश मे एक इसाई,
जिसका नाम सेंट वेलेन्टाइन था ।
वहां की राजा की बेटी से,
भरपूर प्यार भी उसको था ॥
बिना शादी के लड़का-लड़की,
सारे रिश्ते कर सकते हैं ।
पति-पत्नी नही तो क्या,
वे प्रेमी जोड़े बन कर रह सकते हैं ॥
ये बात उसने राजा से,
बड़ी निडरता से कह डाला ।
लाल रंग के दिल को उसने,
राजकुमारी की झोली मे डाला ॥
उसकी गुस्ताखी देख के राजा,
उसे फासी की सजा है सुनवाया ।
चौदह फरवरी के दिन ही उसको,
सजाए मौत है दिलवाया ॥
इसी दिन को याद करके प्रेमी,
अपने प्यार को खुब रिझाते हैं ।
प्यार-मुहब्बत करके वे,
वेलेन्टाइन डे को मनाते हैं ॥
पर पश्चिमी सभ्यता का अंधाधुंध अनुकरण मित्रों,
वर्तमान मे लग रहा होगा अच्छा ।
पर इसका दुष्परिणाम भयंकर होगा,
ये बात भी मित्रों है सच्चा ॥
पर इसका दुष्परिणाम भयंकर होगा,
ये बात भी मित्रों है सच्चा ……..

मोहन श्रीवास्तव

फरवरी महिना पर कविता

लोग कहते हैं इश्क़ कमीना है
हम कहते हुस्न का नगीना है।
देखो चली है मस्त हवा कैसी
आ रहा मुहब्बत का महीना है।

जनवरी संग गुजर गयी सर्दी
प्यार का ये फरवरी महीना है।
वेलेंटाइन तो पश्चिमी खिलौना
यहां तो सदियों से ही मनता
रहा मदनोत्सव का महीना है।

सोलहो श्रृंगार कर रही सजनी
आ रहा उसका जो सजना है।
यमुनातट आया कृष्ण कन्हैया
संग राधा नाचती ता-ता थैया है।
मुरली के धुन पर गोपियां क्या?
वृंदावन की नाची सारी गैया है।

फूलों की सुगंध देखो मकरंद
कैसा उड़ता फिरता बौराया है।
बागों में लगे है फूलों के झूले
झूलती सजनी संग सजना है।
धरा पे पुष्पों सजा ये गहना है
आया मुहब्बत का ये महीना है।

वंसतोत्सव में झूमता सदियों से
आर्यावर्त का नाता ये पुराना है
प्रेम की हम करते हैं इबादत
नही वासना का झूठा बहाना है।

कृष्ण राधा का मीरा का माधव
रति कामदेव का ही ये महीना है
आया मुहब्बत का ये महीना है
इश्क़ वाला ये फरवरी महीना है।   

पंकज भूषण पाठक “प्रियम”

वो प्यार जो हकीकत में प्यार होता है – मधुमिता घोष

वो प्यार जो हकीकत में प्यार होता है,
उसमें न कोई जीत,न कोई हार होता है,
न होता है भाव अहम का,
न होता है शब्द रहम का,
बस एक -दूजे की खुशी में सारा संसार होता है।
वो प्यार…………………….

न बीते दिनों की सच्चाई जुदा करती है,
न अकेले में तन्हाई जुदा करती है,
बस आँखों में प्यार का महल होता है,
दिल में प्यार का सम्बल होता है, अपने प्यार की खुशी में ही संसार होता है।
वो प्यार…………………………..

न बारिश में वो भीगता है,
न पतझड़ में वो सूखता है,
हर मौसम में जिस पर,
यौवन का खुमार होता है,
अपने प्यार की एक मुस्कुराहट के लिए जो न्यौछावर बार-बार होता है।
वो प्यार………………………..

आँखों का समंदर जब,
उसकी यादों में फूटता है,
दिल न जाने इस दरमियाँ,
कितनी बार टूटता है,
फिर भी मन में उम्मीदों का आसार होता है।
वो प्यार……………….….

मधुमिता घोष

तुम्हारी यही बातें मुझे अच्छी लगतीं हैं

तुम्हारी यही बातें मुझे अच्छी लगतीं हैं
गुज़रे यादों में जो रातें मुझे अच्छी लगतीं हैं


तुम्हें न देखूँ तो दिल को न मेरे चैन मिलता है
छुप छुप के मुलाकातें मुझे अच्छी लगतीं हैं
दिल में दबा के रखते हो तुम जिन अरमानो को
वो छुपी छुपी तेरी चाहतें मुझे अच्छी लगतीं हैं


सुना है प्यार करने वाले हिम्मत वाले होते हैं
ये रंज और ये आफतें मुझे अच्छी लगतीं हैं
तुम ये रोज़ लिख लिख कर जो मुझको भेजते हो
ये ख़त में प्रेम सौगातें मुझे अच्छी लगतीं हैं

निशां उल्फ़त का दामन से सुनो रह रह के जाता है
चुनरिया तुम जो रंग जाते मुझे अच्छी लगतीं हैं
तेरी ‘चाहत’ है वो ख़ुशबू बिखरी मेरे तन मन पे
निगाहों की करामातें मुझे अच्छी लगतीं हैं


नेहा चाचरा बहल ‘चाहत’
झाँसी

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3 Comments
  1. Nitesh Gupta says

    बहुत ही सुंदर एवं मनमोहन कविता

  2. प्रियांशु says

    सुन्दर कविता ,
    एसे कविता लिखते रहो

  3. Ritesh says

    Nice 😊👍

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