प्रेम का अनुप्रास बाकी

प्रेम का अनुप्रास बाकी

आर आर साहू, छत्तीसगढ़: ” प्रेम का अनुप्रास बाकी “

सत्य कहने और सुनने की कहाँ है प्यास बाकी।
क्या विवशता को कहेंगे,है अभी विश्वास बाकी।

आस्थाओं,धारणाओं,मान्यताओं को परख लो,
रह गई संवेदना की आज कितनी साँस बाकी।

दृष्टिहीनों को तमस् का बोध कैसे हो सकेगा,
है नहीं जिनके दृगों में ज्योति का उल्लास बाकी।

मृत विचारों में कहाँ कब नृत्य जीवन का मिलेगा,
मुक्त चरणों के लिए तो मृत्यु में भी रास बाकी।

ध्वंस की सामग्रियों में शक्ति का जो दंभ पाले,
है सदा उनके लिए नव सृष्टि का उपहास बाकी।

क्षुद्र रेखाएँ तुम्हारी,क्षुद्र सीमाएँ तुम्हारी,
है कहाँ स्वामित्व अंतर वासना का दास बाकी।

सृष्टि सहअस्तित्व है,सहकार है संगीत इसका,
है मधुर सहगान सा संदेश इसके पास बाकी।

चेतना को सूर्य के पुत्रों कभी सोने न देना,
है धरा से व्योम तक संहार का संत्रास बाकी।

क्लेश का हो श्लेष अथवा यंत्रणाओं का यमक हो,
भूलना मत पास अपने प्रेम का अनुप्रास बाकी।

रेखराम साहू (बिटकुला बिलासपुर छग )

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