प्रेमचन्द साव प्रेम पर कविता

(1)
हिमालय है मुकुट जैसा,
चरण में हिन्द महासागर।
कहीं पर राम जन्मा है,
कहीं राधा नटवर नागर।
है अपना देश मुनियों का,
जहाँ पर धर्म पलता हैं।
ये भारत वर्ष हैं अपना,
जहाँ है प्रेम का गागर।

               (2)
जुबां पर प्रेम की बोली,
हृदय में धर्म को धारो।
कहीं मनभाव में जीना,
कहीं मनभाव को मारो।
मगर माँ भारती को,
जो दिखाए द्वेष से आंखें।
नहीं एकपल करो देरी,
तुरत ही दुष्ट संघारो।

            (3)
नहीं हो द्वेषता मन में,
न ही कोई भी दंगा हो।
जो सबका पाप धोती है,
सदा सुरभित वह गंगा हो।
भले मर मिट जाए हम,
इस जहाँ में गम नहीं यारों।
मगर इस देश में अपने,
लहराता तिरंगा हो।

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प्रेमचन्द साव प्रेम
बसना,महासमुंद
मो.नं. 8720030700
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