KAVITA BAHAR
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समझ ले वर्षारानी

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समझ ले वर्षारानी


१३ मात्रिक मुक्तक
. (वर्षा का मानवीकरण)

बरस अब वर्षा रानी,
बुलाऊँ घन दीवानी।
हृदय की देखो पीड़ा,
मान मन प्रीत रुहानी।

हितैषी विरह निभानी,
स्वप्न निभा महारानी।
टाल मत प्रेम पत्रिका,
याद कर प्रीत पुरानी।

प्राण दे वर्षा रानी।
त्राण दे बिरखारानी।
सूखता हृदय हमारा,
देह से नेह निभानी।

तुम्ही जानी पहचानी,
वही तो बिरखा रानी।
पपीहा तुम्हे बुलाता,
बनो मत यूं अनजानी।

हार कान्हा से मानी,
सुनो हे मन दीवानी।
स्वर्ग में तुम रहती हाँ,
तो हम भी रेगिस्तानी।

सुनो हम राजस्थानी,
जानते आन निभानी।
समझते चातक जैसे,
निकालें रज से पानी।

भले करले मनमानी,
खूब करले नादानी।
हारना हमें न आता,
हमारी यही निशानी।

मान तो मान सयानी,
यादकर पुरा कहानी।
काल दुकाल सहे पर,
हमें तो प्रीत निभानी।

तुम्हे वे रीत निभानी,
हठी तुम जिद्दी रानी।
रीत राणा की पलने,
घास की रोटी खानी।

जुबाने हठ मरदानी,
जानते तेग चलानी।
जानते कथा पुरातन,
चाह अब नई रचानी।

यहाँ इतिहास गुमानी।
याद करता रिपु नानी।
हमारी रीत शहादत,
लुटाएँ सदा जवानी।

सतत देते कुर्बानी,
हठी हे वर्षा रानी।
श्वेद से नदी बहाकर,
रखें माँ चूनर धानी,

प्रेम की ऋतु पहचानी,
लगे यह ग्रीष्म सुहानी।
याद बाते सब करलो,
करो मत यूँ शैतानी।

निभे कब बे ईमानी,
चले ईमान कहानी।
आन ये शान निभाते,
समझते पीर भुलानी।

बात की धार बनानी,
रेत इतिहास बखानी।
तुम्ही से होड़ा- होड़ी,
मेघ प्रिय सदा लगानी।

व्यर्थ रानी अनहोनी,
खेजड़ी यों भी रहनी।
हठी,जीते कब हमसे,
साँगरी हमको खानी।

हमें, जानी पहचानी,
तेरी छलछंद कहानी।
तुम्ही यूँ मानो सुधरो,
बचा आँखों में पानी।

जँचे तो आ मस्तानी,
बरसना चाहत पानी।
भले भग जा पुरवैया,
पड़ी सब जगती मानी।

याद कर प्रीत पुरानी,
झुके तो बिरखारानी।
सुनो हम मरुधर वाले,
रहे तो रह अनजानी।

मान हम रेगिस्तानी,
बरसनी वर्षा रानी।
मल्हारी मेघ चढ़े हैं।
समझ ले वर्षा रानी।
———–
बाबूलाल शर्मा

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