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सन्नाटों के कोलाहल में

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सन्नाटों के कोलाहल में

सन्नाटों के कोलाहल में
नदियों के यौवन पर पहरा।
लम्पट पोखर ताल तलैया
सोच रहे सागर से गहरा।।
. १
ज्वार उठा सागर में भारी
लहरों का उतरा है गहना
डरे हुए आँधी अँधियारे
वृक्ष गर्त में ठाने रहना।

मन पंछी उन्मुक्त गगन उड़
वापस नीड़ों में आ ठहरा।
. २
खेत खेत सूखी तरुणाई
मुख पर चीर दुपट्टा बाँधे
काल कहार मसलते देखो
तेल हाथ ले अपने काँधे

जूहू चौपाटी नदिया तट
रक्तबीज का झण्डा फहरा।
. ३
कंचन कामी तरुण कामिनी
लता चमेली मुँह को ढाँपे
प्रेम गली पथ दीवारें तम
शयन कक्ष भी थर थर काँपे

मीत मिताई रिश्ते नाते
रोक पंथ ही पढे ककहरा।
. ४
चौक चाँदनी जंतर मंतर
पगडंडी पथ गलियारों के
घूँघट के पट लगे हुए हैं
माँझी नद खेवनहारों के
लाशें शोर मचाएँ भारी
पुतले देखें दहन दशहरा।
सन्नाटों के…………..।।


बाबू लाल शर्मा *विज्ञ*
बौहरा – भवन, ९७८२९२४४७९
सिकंदरा ,दौसा, राजस्थान ३०३३२६

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