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संस्कार(जीवन मूल्य) पर हिंदी कविता-सुरंजना पाण्डेय

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संस्कार(जीवन मूल्य) पर हिंदी कविता



बलिदानों को क्यूँ कर रहे तिजारत यूं
देश को क्यूँ बाट रहे हर रोज रहे हम यूं।
अपनी देश की मिटटी को क्यों कर रहे
यूं अपमानित क्यूँ अपनी ओछी हरकतों से।


उठा रहे क्यूँ अपनो पे यूं शमशीरे तुम
क्यूँ तौल रहे अपनो को यूं रख के तराजू में।
जाति पाति के बंधन में झूठे पाखण्डो में
आदर्शो और वाह्य आडम्बरो में यूं।


सब व्यर्थ ही रह जाएगा तो यहां
करते हो हाय तौब्बा हर रोज ही क्यों।
अपनो का गला काटते हर रोज यूं
सब खाली रह जाएगा तो यहां।

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खाली हाथ ही आए थे तुम बंदे
खाली हाथ ही यहां से जाओगे तुम।
शर्म करो कुछ तो अपने पे थोड़ा
जीवन में अच्छे कर्म कुछ करो तुम।


चार कंधो पे मुस्कान बिखरते जाओ तुम
मरने का दुख हो सबको ऐसे दिल में बसो तुम।
वरना पीढीयांँ भी कलंकित हो जाएगी
तुम्हारी इन ओंछी गिरी हरकतो पे।


अपने संस्कारो और आदर्शो पे गर्व करो तुम
यूं ना धूल धूसरित करो अपने मर्यादा को तुम।
पैमानो पे तौल सभी को यूं तो रोज क्यों
शर्मिन्दा कर रहे क्युं तुम तो देश को क्यों।


देश है अपना ये सबसे प्यारा सा तो
भाईचारा और अपनापन बना रहने दे।
मानवता को महामण्डित करो तुम
यूं ना अपनी बेवजह की हरकतों
से देश की मर्यादा का हर रोज।
हम अपने हरकतों से यूं दहन ना करे
जीवन मूल्यों को लेकर जीवन में आगे बढे हम।
✍️ सुरंजना पाण्डेय

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