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संतोषी महंत की नवगीत – संतोषी महंत

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संतोषी महंत की नवगीत

संतोषी महंत
kavita bahar

हंसकर जीवन​-अथ लिख दें
या रोकर अंजाम लिखें।
जीवन  की  पीड़ाओं  के
औ कितने आयाम लिखें।।

धाराओं ने सदा संभाला
तटबंधों ने रार किया।
बचकर कांटों से निकले तो
फूलों ने ही वार किया।।
बंटवारा लिख दें किस्मत का
या खुद का इल्जाम लिखें।।
जीवन की पीड़ाओं के…….

चौसर की छाती पर खुशियों
के जब-जब भी पांव परे।
कृष्णा कहलाने वालों ने
संग शकुनि के दांव धरे।।
कपटी को क्यों मीत लिखें
औ दुष्टों को राम लिखें।।
जीवन की पीड़ाओं के……..

बीत्ते भर के इस जीवन की
कितनी अटपट परिभाषा।
स्वप्नों की अनगिन ढेरी औ
तरु सी ऊंची अभिलाषा।।
तस्वीरें धुंधली धुंधली हैं
पर उसको अभिराम लिखें।।
जीवन की पीड़ाओं के………

चाप खींचकर आसानी से
कितने सारे कोण बने।
बाधाओं से जूझ-जूझ कर
हम अर्जुन से द्रोण बने।।
राहों के  अड़चन, अनबन को
हां कुछ तो पैगाम लिखें।।
जीवन की पीड़ाओं के…..

संतोषी महंत “श्रद्धा”

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