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शुरुआत नई करें कविता

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शुरुआत नई करें कविता

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नये संकल्प दरवाजे पर,
दस्तक दे रहे हैं।
नये प्रयास पास बुला रहे हैं।
नए राहगीर मिल गए,
जो नई दिशा में ले जा रहे हैं।
पुराने दु:ख, पुरानी तकलीफ,
रह-रह कर बाहर आती है।
पुरानी पीड़ा हर रोज हमें, रुलाती है,
पर दर्द की यही चुभन,
नई शुरुआत का आगाज कराती है।
हम भटके परिंदे वर्तमान में कम,
अतीत में ज्यादा गुम रहते हैं।
अच्छे नहीं कटु अनुभव,
हम ज्यादा कहते हैं,
चलो अब आगे बढ़े
क्यों पीछे रह गये हम,
भुला दे उस घड़ी को
जिसने आंखों को किया नम
अब आशावादी हो,
हमारा मन और नई खुशियों को,
समेट ले, ये दामन।

अंकिता जैन अवनी
अशोकनगर मप्र

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