‘सिद्धार्थ, तुम्हें ‘बुद्ध’ बनकर आना ही होगा’

“सिद्धार्थ, तुम्हें ‘बुद्ध’ बनकर आना ही होगा”
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सिद्धार्थ!
ऐसा क्यों ?
फिर चले गये,
सत्य, दिव्य-ज्ञान की खोज,
अपलक राह देखती,
नि:शब्द खड़ी,
यशोधरा!

दुःख,
दूर कैसे,
स्वार्थ, संलिप्त माया,
माटी… माटी, यही ‘जाया’,
मनुजता रोती पड़ी,
दीवार बनी,
ईर्ष्या ।

आओगे,
‘बुद्ध’ बनकर,
लेकर ‘शांति’ अमृतधारा,
सींचन हो मरूभूमि पर,
सृजित पल्लव नवल,
प्रेम, समर्पण,
मनुजधर्म।
– शैलेन्द्र कुमार नायक ‘शिशिर’

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