KAVITA BAHAR
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सुख-दुख की बाते बेमानी

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सुख-दुख की बाते बेमानी

सुख-दुख
( १६,१६)
मैने तो हर पीड़ा झेली।
सुख-दुख की बाते बेमानी।

दुख ही मेरा सच्चा साथी,
श्वाँस श्वाँस मे रहे सँगाती।
मै तो केवल दुख ही जानूँ,
प्रीत रीत मैने कब जानी,
सुख-दुख की बाते बेमानी।

सुख तो केवल छलना है,
मुझे निरंतर पथ चलना है।
बाधाओं से कब रुक पाया,
जब जब मैने मन में ठानी,
सुख-दुख की बातें बेमानी।

अवरोधक है सखा हमारे,
संकट बंधु पड़ोसी सारे।
इनकी आवभगत कर देखे,
कृत्य सुकृत्य हितैषी मानी,
सुख-दुख की बातें बेमानी।

विपदाएँ अच्छी लगती,
मेरा एकाकी पन हरती।
श्वाँस रक्त दोनों ही मैने,
देशधरा की सम्पत्ति मानी,
सुख-दुख की बातें बेमानी।

मन में सुख-दुख जोड़ा है,
दुख ज्यादा सुख थोड़ा है।
दुख में नई प्रेरणा मिलती,
सुख की सोचें ही नादानी,
सुख-दुख की बातें बेमानी।
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बाबू लाल शर्मा,बौहरा

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