मनीभाई नवरत्न की कविता

हे दीन दयालु हे दीनानाथ- मनीभाई नवरत्न

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हे दीन दयालु हे दीनानाथहे दीन दयालु, हे दीनानाथ !दीन की रक्षा करलें मांगे वरदान। हे कृपालु ,हे भोलेनाथ! हे कृपालु , हे भोलेनाथ!हीन की रक्षा कर ले मांगे वरदान । ऊंची चोटी पर तेरा वास है ।हर तरफ शांति, उल्लास है। छायी रहे ऐसे सदा, अमन से ये जहान। मांगे वरदान। हे दीन दयालु…. […]

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मैं इंसान हूं मेरे भी अरमान है- मनीभाई नवरत्न

हिंदी कविता

मैं इंसान हूं मेरे भी अरमान है- मनीभाई नवरत्न मैं इंसान हूं मेरे भी अरमान है ।जैसे तेरी पहचान वैसे मेरी पहचान है। जो तू सोचता है वह मेरी सोच है ।जो तू खोजता है वह मेरी खोज है।इस बात पर भला क्यों अनजान है ? मैं इंसान हूं….जब मैं राहों से गुजरता हूं तु

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तुम तो लूटोगे ही प्यारे,लुटेरों की बस्ती में

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तुम तो लूटोगे ही प्यारे,लुटेरों की बस्ती में पुकार रहे हो किससे बंदेखुद ही हो रहबर अपना।छिप रहे हो कहां कहां पे कहीं नहीं है घर अपना ।। आबरू की फिक्र है तुझे जाएगी कभी जो सस्ती में ।।तुम तो लूटोगे ही प्यारे ,हुस्न पाई लुटेरों की बस्ती में।। तेरी जिद करने को हासिल इस

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मनीभाई के पिरामिड रचना

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मनीभाई के पिरामिड रचना ★कलम,कागज,कलमकार★मैंएकअबूझतुकबंदीकलमकारहोता ज्यों व्यथितदेता उसे आकारहै मेरे सहचरकलम कागजमुखर नहींमुझ जैसानिशब्ददोनोंही। मनीभाई”नवरत्न” मनीभाई के पिरामिड रचना ★मरणासन्न★ येमेरीकौन सीहै अवस्थाजहाँ से अबदिखता है सचहोने लगा पवित्रकैसी भुलभुलैयाअब चला पतामरणासन्नहकीकतजिन्दगीदिखादी। “मनीभाई”नवरत्न” मनीभाई के पिरामिड रचना ★रिश्ते नातों का जाल★ ये जगअजीबजहाँ परहोती सबकीअलग जिन्दगीतथापि समाहितरिश्ते नातों का जालखट्टी मीठी यादेंआगे बढ़ातीकहानी कोहरेकसिरेमें।“मनीभाई” नवरत्न,मनीभाई

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मन की आंखें

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मन की आंखें पात्र परिचय :-रागिनी –  एक कामकाजी लड़की।राजन-    अंधा व्यक्ति ।राहुल –   रागिनी की सहकर्मी । (रागिनी अपनी ऑफिस की ओर जा रही थी। रास्ते में एक अंधा आदमी सड़क किनारे खड़ा हुआ सड़क पार करने की कोशिश रहा था ।) रागिनी : (ऑटो से ही)भैया !अभी मुझे अपने ऑफिस तक नहीं जानी

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आ सनम आ मेरे दिल में तू आ

हिंदी कविता

आ सनम आ मेरे दिल में तू आ आ सनम आ ,मेरे दिल में तू आ।आ सनम आ मेरे दिल को चुराके जा । जाने जा मैंने तुम्हें प्यार किया ।रात दिन तुझे याद किया ।अब तो मुझसे रूठ के ना जा जा ।। फूलों से खुशबू आ रही ।भंवरे झुमके यह गा रही ।मैंने

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cycle

सायकिल दिवस कविता (Poem on World Cycle Day)

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सायकिल दिवस कविता (Poem on World Cycle Day) मनीभाई की कविता अपने बचपन में , की थी जिससे यारी। वो मेरी सायकिल,जिसमें करूँ सवारी । आज बदहाल पड़ा, कहीं किसी कोने में सेवा कर गुजारी, जिसने जिंदगी सारी। ना वो ईंधन लेता, ना फैलायें प्रदूषण । ना दुर्घटना का भय,सुरक्षित हो जीवन। ना कोई झंझट

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सलाम हुजूर तुझे मेरा सलाम

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सलाम हुजूर तुझे मेरा सलाम तेरी जुल्फों की छैयां तले है अपना मकान ।तेरे आशिकों के बही खाते में है अपना नाम ।सलाम हुजूर तुझे मेरा सलाम सुने हैं मेरे कानों में तेरे अदाओं के चर्चेबटे हैं जगह जगह तेरे कलाओं के परचे।लिखे हैं बस मैंने तेरे.तारीफों के कलाम ।सलाम हुजूर तुझे मेरा सलाम ।

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घर के कितने मालिक -मनीभाई नवरत्न

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घर के कितने मालिक वाह भाई !मैंने ईंटें लाई ।सीमेंट ,बालू , कांक्रीट, छड़और पसीने के पानी सेखड़ा कर लियाअपना खुद का घर।बता रहा हूँ सबकोमैं असल मालिक। ये “मैं और मेरा “मेरे होते हैं सोने के पहले।जैसे ही आयेगी झपकी।आयेंगे इस घर केऔर भी मालिकबिखेरेंगे कुतरेंगे सामान ।वही जिसे मैं कहता थाएन्टीक पीस।बताता था

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Jai Sri Ram kavitabahar

मेरा मन लगा रामराज पाने को /मनीभाई नवरत्न

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राम/श्रीराम/श्रीरामचन्द्र, रामायण के अनुसार,रानी कौशल्या के सबसे बड़े पुत्र, सीता के पति व लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्न के भ्राता थे। हनुमान उनके परम भक्त है। लंका के राजा रावण का वध उन्होंने ही किया था। उनकी प्रतिष्ठा मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में है क्योंकि उन्होंने मर्यादा के पालन के लिए राज्य, मित्र, माता-पिता तक का त्याग किया। मेरा मन लगा रामराज पाने को / मनीभाई नवरत्न मेरा मन लागा रामराज पाने को । मेरा

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मैं उड़ता पतंग मुझे खींचे कोई डोर

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मैं उड़ता पतंग मुझे खींचे कोई डोर मैं उड़ता पतंग ….मुझे खींचे कोई डोर।तेरी ही ओर।।मेरा टूट न जाए धागा।भागा ….भागा…भागा ….मैं खुद से भागा।जागा.. जागा….जागा.. कभी सोया कभी जागा ।कुछ ख्वाहिशें हैं ,कुछ बंदिशें हैं।पग-पग में देखो साजिशें है ।जिसने जो चाहा है कब वो पाया है ।पल पल में तो मुश्किलें है ।यह

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beti

सिमटी हुई कली/मनीभाई नवरत्न

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सिमटी हुई कली/मनीभाई नवरत्न सिमटी हुई कली ,मेरे आंगन में खिली।शाम मेरी ढली,तब वह मोती सी मिली।रोशनी छुपाए जुगनू सासारी सारी रात मेरे घर में जली । चंचलता ऐसी जैसे कोई पंछीओढ़े हुए आसमां की चिर मखमली।खुशबू फैल जाए जहां वह मुस्कुराएकदम पड़े उसकी गली गली। सिमटी हुई कली , मेरे आंगन में खिली।

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