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तुझको क्या लगता है

महिला दिवस पर विशेष रचना

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तुझको क्या लगता है

नारी शक्ति (महिला जागृति)

सैलाब को समेटे खुद में
वो शीतल मंद नदी से बहती है
और तुझको क्या लगता है नारी शक्तिहीन होती है।

मान सम्मान परंपराओं के आवरण में
वो खुद की क्षमताओं की सीमाओं को बांधे रखती है
और तुझको क्या लगता है नारी शक्तिहीन होती है।

जागृत ज्वाला प्रचंड है वो
पर स्वभाव ठंडी गंगाजल सी रखती हैं
और तुझको क्या लगता है नारी शक्तिहीन होती हैं।

कौन जंजीरों में बांध सका है उसको
वो प्रेम वशीभूत अपना सब कुछ समर्पण करती है
और तुझको क्या लगता है नारी शक्तिहीन होती है।

कि कैसे आवाहन करूं मैं नारी कि जागृति का
वो जागृत देवी स्वरूपा हर रूप में बसती है
और तुझको क्या लगता है नारी शक्तिहीन होती है।

By- pransu gupta

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