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वतन परस्ती में खुद को

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वतन परस्ती में खुद को

नाम वतन के अपनी आन और शान कर
वतन परस्ती में खुद को कुर्बान कर


है हिम्मत तो आगे आओ,
देशभक्ति का बिगुल बजाओ
देखो लुटेरा लूट रहा है,
माँ बहनों की लाज बचाओ
देख तू खुद को सच से न अंजान कर
वतन परस्ती में खुद को कुर्बान कर


आज वतन भी ताक रहा है,
कौन फ़र्ज़ से भाग रहा है
मातृभूमि की रक्षा के हित,
कौन हितैषी जाग रहा है
सबसे पहले अपने वतन का मान कर
वतन परस्ती में खुद को कुर्बान कर


साम्प्रदायिकता परवान चढ़ रही
अनैतिकताएं कितनी बढ़ रही
हिन्दू मुस्लिम राजनीति है
सब क़ौमें आपस में लड़ रहीं
बंदे तू तो खुद को हिंदुस्तान कर
वतन परस्ती में खुद को कुर्बान कर


भिन्न भिन्न परिवेश हो चाहे,
अलग भाषा और भेस हो चाहे
जग में हमको एक है रहना
आपस मे कई भेद हों चाहे
वीर शहीदों के पूरे अरमान कर
वतन परस्ती में खुद को कुर्बान कर


वतन की खातिर मरना सीखो
अपने वतन पर मिटना सीखो
आंच न इस कि आन पे आए
इन दावों पर टिकना सीखो
अपनी पावन माटी का सम्मान कर
वतन परस्ती में खुद को कुर्बान कर


अपने वतन की बात निराली,
कहीं ईद और कहीं दीवाली
रंग बिरंगी परम्परा है
यहां भजन और वहाँ कव्वाली
‘चाहत’ है गीतों में तू यशगान कर
वतन परस्ती में खुद को कुर्बान कर

नेहा चाचरा बहल ‘चाहत’
झाँसी
8052476979

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