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हिन्दी दोहा – वायु पर दोहे

सकल सृष्टि पर व्याप्त
वायु पर रचना

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हिन्दी दोहा – वायु पर दोहे

बहती रहती है सदा , होकर वायु अधीर ।
सकल सृष्टि पर व्याप्त है ,और घुँसे प्राचीर ।

होता संभव वायु से , शब्दों का संचार ।
कहते मन की भावना , फिर करते व्यवहार ।।

निर्मल करते वायु को , हरे भरे ये पेड़ ।
मिट जायेगी ये धरा , यूँ न प्रकृति को छेड़ ।।

लेते हैं हम साँस में , इसी प्रकृति से वायु ।
जो नित करते सैर हैं , बढ़ती उनकी आयु ।।

ठोस नहीं आकार है ,फिर भी होता भार ।
रंग गंध से मुक्त ये , जीवन का आधार ।।

गोरी का आँचल उड़ा , पवन बना बलवीर ।
करे आकर्षित मेघ को , बरसाने को नीर ।।

रंग बिरंगे उड़ रहे , नभ में कई पतंग ।
हिचकोले खाती फिरैं , मन में जगी उमंग ।।

मिलती धरती के तले , घुली नीर के संग ।
बहती बनकर शक्ति ये , जीवों के हर अंग ।।

जीते सब हैं जिंदगी , हवा प्रमुख आधार ।
बिन इसकी संसार मृत , जीवन जाते हार ।।

देख प्रदूषण नित बढ़े , जहर घुले अब वायु।
धूल धुँआ इसमें सना , घटती सबकी आयु ।।

*सुकमोती चौहान "रुचि"* *बिछिया,महासमुन्द*

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