KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

विद्यार्थी की व्यथा

विद्यार्थी की विचलित मनःस्थिति का वर्णन

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‘विद्यार्थी की व्यथा’

सूनी है गलियाँ।
सूनी नजरियाँ।
किसके संग खेलूँ मैं आँखमिचौलियाँ।
न दिखे कोई सखा न सहेलियाँ ,
शाला में भी लग गयी कुन्डियाँ,
कहाँ गई शाबाशी की थपकियाँ,
अब न बताते कोई मेरी गलतियाँ ,
तरस रही है मेरी अखियाँ,
कब खुलेंगी मेरी शाला की कुन्डियाँ।
प्रातः माँ की उलाहना और प्यारी बलैयाँ ,
दोस्तों के संग ली गई चुटकियाँ ,
टिफ़िन में से चुराती इडलियाँ
शाला से घर आते बाँट जोहती पगडंडियाँ,
अब न बीते दिन और रतियाँ,
शाला जल्दी खुले बस यही है विनतियाँ ।
यही है विनतियाँ यही है विनतियाँ ।।

माला पहल’ मुंबई

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