वतन को नमन करता हूँ

वतन को नमन करता हूँ

भारत माँ की चरण धूलि,
चंदन माथे धरता हूँ ।
सपूत हूँ नाम वतन के ,
जीवन अर्पण करता हूँ ।


बहता शोणित यूँ रगों में,
जलते अंगारों सा
सिंधु प्रलय सा उठती लहरें,
उर में ललकारों का
सिंहनाद हूँकारें भरकर,
शत्रुओं से नित लड़ता हूँ।


माँ की कोख निहाल होती
माटी का कर्ज चुकाता हूँ
अस्मिता की रक्षा खातिर
प्राणोत्सर्जन कर जाता हूँ
मातृभूमि के परवाने बन,
ज्वाल चिता पर जलता हूँ


इस माटी की गंध में लिपटे
जाने कितने कितने नाम
राणा शिवा सावरकर जैसे
है वतन के ये अभिमान
राज गुरू चंद्रशेखर बन
हँसकर फांसी चढ़ता हूँ


बेड़ियों में जकड़ी माता
जब जब अश्रु बहाती है
सिसक उठती हैं सदियाँ
बूँद बूँद कीमत चुकाती है
बन राम कृष्ण अवतरित होता
पीड़ा जगत की हरता हूँ


युगों- युगों से चलती आई
भारत की अमर कहानी
जब -जब संकट आया भू पर
बेटों ने दी है सदा कुर्बानी
जन गण मन साँसों में समाहित
वतन को नमन करता हूँ।


सुधा शर्मा
राजिम छत्तीसगढ़

Please follow and like us:

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You cannot copy content of this page