आड़े वक्त में पैसों की उपयोगिता बताती हुई रजनी श्री यह कविता (विश्व बचत दिवस)

*विश्व बचत दिवस विशेष कविता*

पैसों का जब पेड़ नही तो
पैसे क्योँ लुटाए हम,
क्योँ न जितनी चादर हो,
उतने पैर पसारे हम।
पैसे बनते है कागज़ से,
ये तो सबका भ्रम है रहा।
इसके बनने में तो देखो,
कितना परिश्रम,पसीना बहा।
सुबह ,शाम, तपती दुपहरी, 
के रंगों से बनते रुपये।
खर्च करो इसे सोच समझ कर,
इसमे कइयों के सपने दबे।
कभी पिता के रफू कपड़ों की,
बचत ने तुमको कुछ नया दिया।
कभी बचत कर काट अंधेरा,
त्योहार तुम्हारा रोशन किया।
बचत जरूरी अन्न, पैसों की,
वक़्त आड़े ये काम करें।
 कर के बचत हो राज सदा ,
और बुढ़ापे में आराम करें।
रजनी श्री बेदी
जयपुर
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