KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

ज़ज्बा – ए – वतन

इस कविता के माध्यम से कवि , देश पर मर मिटने वाले जाबाजों के द्वारा दिए गए वतनपरस्ती के ज़ज्बे और सीख को सलाम कर रहा है |

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ज़ज्बा – ए – वतन

पीर दिलों की मिटा के , रोशन किया ज़ज्बा – ए – वतन

मादरे वतन पर मर मिटने का ज़ज्बा सिखा गए |

वतनफ़रोशी का ज़ज्बा थी , उनकी धरोहर

वो राग जिन्दगी का सुनाकर चले गए |

कर गए रोशन अपने देश पर, मर मिटने का ज़ज्बा

वो गीत बन के दिल में समाते चले गये |

अपने लहू से सींच गए , वतनपरस्ती का ज़ज्बा

मादरे वतन पर निसार होने की कला सिखा गए |

मिटा दिया नासूर गुलामी का , कर अपना सर्वस्व समर्पण

जो मर मिटे थे अपने , अपने देश की खातिर चले गए |

गुलामी की जंजीरों से , आजाद कर गए वतन को

माँ भारती के सच्चे सपूत होने का , सिला सिखा गए |

पीर दिलों की मिटा के , रोशन किया ज़ज्बा – ए – वतन

मादरे वतन पर मर मिटने का ज़ज्बा सिखा गए |

वतनफ़रोशी का ज़ज्बा थी , उनकी धरोहर

वो राग जिन्दगी का सुनाकर चले गए | |

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