रंग इन्द्रधनुष

हिंदी कविता

रंग इन्द्रधनुष ….. धरती का हरापन सदा से बुलाते रहे मुझेमैं उसके आँचल में दूब बनकर पसर गया ,नीला विस्तृत आकाश हुर्र बुलाता रहा मुझेमैं उसमें घुसकर नीलकंठ हो गया ,मैं उनकी गली के गुलाबी रंग बीचप्रेम प्याला पीकर महक गया ;युवा बसंत को सजाते हुए कभीकाँपे नहीं मेरे हाथ लेकिनअपनी बेटी को विदा करते

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हमर छेरछेरा तिहार पर कविता

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गीत – हमर छेरछेरा तिहार ============================= सुख के सुरुज अंजोर करे हे,हम सबझन के डेरा म। हाँसत कुलकत नाचत गावत,झूमत हन छेरछेरा म।। //1// आज जम्मो झन बड़े बिहनिया, ले छेरछेरा कुटत हे। कोनलईका अउ कोन सियनहा,कोनो भी नई छूटत हे। ये तिहार म सब मितान हे,इही हमर पहचान हावय। मनखे मन ल खुशी देवैईया,सोनहा

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सादगी पर सायरी

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सादगी पर सायरी सादगी की सुरत सुहानी बनावट की बातों का काम नहीं है। सादगी की खुबसूरत जवानी बेतहासा सजावट का काम नहीं है। सादगी की जरूरत जिसने जानी अधिक जरूरत का कोई काम नहीं है। सादगी की है सफल कहानी सफर में थकावट का काम नहीं है। राजीव कुमार बोकारो स्टील सिटी झारखण्ड 8797905224

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मन पर कविता

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मन पर कविता मन सरिता बहाती कलकल स्वछन्द वेग से तेरी स्मृतियों का जल। मन सरिता की गहराई अथाह तेरी स्मृतियों का ही रखरखाव। मन सरिता की लहरें अशांत कभी न चाहे तेरी स्मृतियों का अंत। मन सरिता का जहाँ भी मोड़ तेरी स्मृति का ही एक छोर। मन सरिता की अतृप्त प्यास तेरी स्मृति

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लातन को जो भूत हियन पै – उपेन्द्र सक्सेना

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लातन को जो भूत हियन पै पर कविता जिसके मन मै ऐंठ भरै बौ, अपने आगे किसकौ गिनिहैलातन को जो भूत हियन पै,बातन से बौ नाहीं मनिहै। अंधो बाँटै आज रिबड़ियाँ, अपनिन -अपनिन कौ बौ देबैनंगे- भूखे लाचारन की, नइया कौन भलो अब खेबैआँगनबाड़ी मै आओ थो, इततो सारो माल बटन कौबच्चन कौ कछु नाय

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नवनिर्माण पर कविता – विनोद सिल्ला

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नवनिर्माण पर कविता पत्थरों और ईंटों मेंहुआ मुकाबलामची होड़एक-दूसरे कोमुंहतोड़ जवाब देने की पत्थर से ईंटईंट से पत्थर खूब टकराएटूटी ईंटेंक्षतिग्रस्त हुए पत्थर हो जाता मुकाबलादोनों मेंकौन करेगासुंदर नवनिर्माण तब मुकाबले के साथ-साथ हो जाती राह प्रशस्त नवनिर्माण की बन जाते भवननहर, पुल, सड़कव अन्य जीवनोपयोगी संसाधन। –विनोद सिल्ला

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चोर- चोर मौसेरे भइया – उपमेंद्र सक्सेना

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चोर- चोर मौसेरे भइया अंधिन के आगे जो रोबैं,बे अपने नैनन कौ खोबैंचोर -चोर मौसेरे भइया,बे काहू के सगे न होबैं। कच्ची टूटै आज गाँव मै,ठर्रा केते पियैं लफंगापुलिस संग मैं उनके डोलै, उनसे कौन लेयगो पंगारोज नदी मै खनन होत है, रेता बजरी चोरी जाबैरोकै कौन इसै अब बोलौ,रोकन बारो हिस्सा खाबै खुद फूलन

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नए साल की बधाई – अकिल खान

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————– नए साल की बधाई – – – – – – – – – – अतीत के साए में,बीते पल गुजर गए,संघर्ष के मैदान में,परिश्रमी संवर गए।2022 में मेहनतकशों को मंजिल मिल गया,मुरझाए हुए,तन्हा,चेहरों में हंसी खिल गया।प्रकृति ने भी खुशनुमा,माहौल है सजाई,आप सभी लोगों को,नए साल की बधाई। प्रकृति अपनी रीत,हर-पल दोहराती है,यादों के

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शबरी का बेर

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कविता -शबरी के बेर शबरी का वह बेर नही था सच्ची भक्ती प्रेम वही था ना छुआछूत ना जाति पात भाव भक्ति अनमोल वही था शबरी का संदेश यही था, शबरी का वह बेर नही था। बेरों सा अच्छाई चुन लो मीठी मीठी सपने बुन लो राह देखती शबरी सा तुम आहट अपने मन में

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नई भोर हुई – सुशी सक्सेना

प्रकृति और पर्यावरण

. नई भोर हुई – सुशी सक्सेना नई भोर हुई, नई किरन जगी।भूमि ईश्वर की, नई सृजन लगी। नई धूप खिली, नई आस पली,ओढ़ के सुनहरी चुनरी प्रकृति हंसी,नया नया सा आकाश है, नये नज़ारे,नववर्ष में कह दो साहिब, हम तुम्हारेसुनकर जिसे, मन में तपन लगी। नववर्ष में है, बस यही मनोकामना,दंश झेले जो हमने

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कोरोना पर कविता – उपमेंद्र सक्सेना

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कोरोना पर कविता कोरोना फिरि फैलि रहो है, बाने देखौ केते मारेकाम नाय कछु होय फिरउ तौ, निकरंगे घरि से बहिरारे। मुँह पै कपड़ा नाय लगाबैं, केते होंय रोड पै ठाड़ेबखरिन मै मन नाय लगत है, घरि से निकरे काम बिगाड़े जाय किसउ की फसल उखाड़ैं, खेतन कौ बे खूब उजाड़ैंकोऊ उनसे नाय कछु कहै,

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atal bihari bajpei

अटल बिहारी वाजपेई जी पर कविता

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अटल बिहारी वाजपेई जी पर कविता 25 दिसंबर,1924 को, ग्वालियर की पवित्र भूमि पर,एक दिव्य पुत्र ने जन्म लिया। धन्य हुई भारत की धरती, भारतरत्न जो आए थे। राजनीति के प्रखर प्रवक्ता, भारतरत्न से सम्मानित थे,हिंदी कवि और पत्रकार के रूप में भी वो जाने जाते हैं।चार दशक तक राजनीति में जो सक्रिय भूमिका निभाए

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