कविता बहार

"कविता बहार" हिंदी कविता का लिखित संग्रह [ Collection of Hindi poems] है। जिसे भावी पीढ़ियों के लिए अमूल्य निधि के रूप में संजोया जा रहा है। कवियों के नाम, प्रतिष्ठा बनाये रखने के लिए कविता बहार प्रतिबद्ध है।

तितली पर बाल कविता / पद्म मुख पंडा

हिंदी कविता

तितली पर बाल कविता / पद्म मुख पंडा रंग बिरंगी तितली रानीआई हमरे द्वार मधुलिका ने उसको देखा,उमड़ पड़ा था प्यार!गोंदा के कुछ फूल बिछाकर,स्वागत किया सुहाना,तितली रानी, तितली रानी! मधुर कंठ से गाना!तेरा मेरा नाता तो है,बरसों कई पुराना!आई हो अभ्यागत बनकर,अभी नहीं तुम जाना,शहद और गुलकंद रखा है,बड़े मज़े से ख़ाना!घर में तुम्हें […]

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पालक जागरूकता पर कविता / डॉ विजय कन्नौजे

हिंदी कविता

पालक जागरूकता पर कविता / डॉ विजय कन्नौजे बुलाते हैं शिक्षक पालक कोपर आते नहीं है लोग।पालक बालक जागरूक होशिक्षक को लगाते दोष।‌अनुशासन की पाठ कहें तोकुछ शिक्षक नही निर्दोष।गेहूं के संग है कुछ घुन पीसेशिक्षक गरिमा हो दोस्त।। शिक्षा विभाग पद गरिमामानते हैं लोग गुरूनंत।विद्यालय है एक मंदिरजहां बाल रूप भगवंत।। बाल पाल अरू

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चमकते सितारे/ आशीष कुमार

हिंदी कविता

चमकते सितारे नन्हे नन्हे और प्यारे प्यारेआसमान में चमकते सितारेदेखा दूर धरती की गोद सेलगता पलक झपकाते सारे ऊपर कहीं कोई बस्ती तो नहींजहाँ के चिराग दिखाएँ नजारेउड़ा ले गया कोई जुगनुओं कोआकाशगंगा सा टिमटिमाते सारे जला आया कोई दीपक लाखोंया मोमबत्तियाँ धरती को निहारेंलालटेनों की रोशनी तो नहींजो सुबह-सवेरे बुझ जाते बेचारे जड़ दिए

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काम पर कविता/ सुकमोती चौहान

हिंदी कविता

काम पर कविता लाख निकाले दोष, काम होगा यह उनका।उन पर कर न विचार, पाल मत खटका मन का।करना है जो काम, बेझिझक करते चलना।टाँग खींचते लोग, किन्तु राही मत रुकना।कुत्ते सारे भौंकते, हाथी रहता मस्त है।अपने मन की जो सुने, उसकी राह प्रशस्त है। ये दुनिया है यार, चले बस दुनियादारी।बन जायेगा बोझ, शीश

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बसंत ऋतु

बसंत ऋतु / राजकुमार मसखरे

प्रकृति और पर्यावरण

राजा बसंत / राजकुमार मसखरे आ…जा आ…जाओ,हे ! ऋतुराज बसन्त,अभिनंदन करते हैं तेरा, अनन्त अनन्त ! मचलते,इतराते,बड़ी खूबसूरत हो आगाज़,आओ जलवा बिखेरो,मेरे मितवा,हमराज़ ! देखो अब ये सर्दियाँ, ठिठुरन तो जाने लगी,यह सुहाना मौसम, सभी को है भाने लगी ! पेड़- पौधों में नव- नव कोपलें आने को हैं,अमियाँ में तो बौर ही बौर ,लद

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बसंत ऋतु

वसंत ऋतु / डा मनोरमा चंद्रा ‘ रमा ‘

हिंदी कविता

वसंत ऋतु / डा मनोरमा चंद्रा ‘ रमा ‘ आया वसंत आज, भव्य ऋतु मन हर्षाए। खिले पुष्प चहुँ ओर, देख खग भी मुस्काए।। मोहक लगे वसंत, हवा का झोंका लाया। मादक अनुपम गंध, धरा में है बिखराया।। आम्र बौर का गुच्छ, लदे हैं देखो सारी।सृजित नवल परिधान, वृक्ष की महिमा भारी।।ऋतुपति दिव्य वसंत, श्रेष्ठ

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चार के चरचा/ डा.विजय कन्नौजे

हिंदी कविता

चार के चरचा*****4*** चार दिन के जिनगी संगीचार दिन के‌ हवे जवानीचारेच दिन तपबे संगीफेर नि चलय मनमानी। चारेच दिन के धन दौलतचारेच दिन के कठौता।चारेच दिन तप ले बाबूफेर नइ मिलय मौका।। चार भागित चार,होथे बराबर गण सुन।चार दिन के जिनगी मचारो ठहर गुण।। चार झन में चरबत्ता गोठचारो ठहर के मार।चार झनके‌ संग

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patang subh makar sankranti

मकर संक्रांति आई है / रचना शास्त्री

नारी जीवन और संवेदना

मकर संक्रांति आई है / रचना शास्त्री मगर संक्रांति आई है। मकर संक्रांति आई है। मिटा है शीत प्रकृति में सहज ऊष्मा समाई है। उठें आलस्य त्यागें हम, सँभालें मोरचे अपने । परिश्रम से करें पूरे, सजाए जो सुघर सपने | प्रकृति यह प्रेरणा देती । मधुर संदेश लाई है। मिटा है शीत प्रकृति में

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तुझे कुछ और भी दूँ !/ रामअवतार त्यागी

हिंदी कविता

तुझे कुछ और भी दूँ !/ रामअवतार त्यागी तन समपित, मन समर्पित और यह जीवन समर्पित चाहता हूँ, देश की धरती तुझे कुछ और भी दूँ! माँ ! तुम्हारा ऋण बहुत है, मैं अकिंचन किंतु इतना कर रहा फिर भी निवेदन, थाल में लाऊँ सजाकर भाल जब स्वीकार कर लेना दयाकर वह समर्पण ! गान

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बज उठी रण-भेरी / शिवमंगलसिंह ‘सुमन’

हिंदी कविता

बज उठी रण-भेरी / शिवमंगलसिंह ‘सुमन’ मां कब से खड़ी पुकार रही, पुत्रों, निज कर में शस्त्र गहो । सेनापति की आवाज हुई, तैयार रहो, तैयार रहो। आओ तुम भी दो आज बिदा, अब क्या अड़चन, अब क्या देरी ? लो, आज बज उठी रण-भेरी। अब बढ़े चलो अब बढ़े चलो, निर्भय हो जय के

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सबकी प्यारी भूमि हमारी / कमला प्रसाद द्विवेदी

हिंदी कविता

सबकी प्यारी भूमि हमारी / कमला प्रसाद द्विवेदी सबकी प्यारी भूमि हमारी, धनी और कंगाल की। जिस धरती पर गई बिखेरी, राख जवाहरलाल की ।। दबी नहीं वह क्रांति हमारी, बुझी नहीं चिनगारी है। आज शहीदों की समाधि वह, फिर से तुम्हें पुकारी है। इस ढेरी को राख न समझो, इसमें लपटें ज्वाल की। जिस

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