कविता बहार

"कविता बहार" हिंदी कविता का लिखित संग्रह [ Collection of Hindi poems] है। जिसे भावी पीढ़ियों के लिए अमूल्य निधि के रूप में संजोया जा रहा है। कवियों के नाम, प्रतिष्ठा बनाये रखने के लिए कविता बहार प्रतिबद्ध है।

आत्मा-अवलोकन

हिंदी कविता

हम डरते रहे आत्मा-अवलोकन से,इस भ्रम में किजैसे ही सच मान लिया,कोई हाथ में पोछा थमा देगाऔर कहेगा —“अब साफ करो,यह तुम्हारी ही गंदगी है।” हम थक चुके थेदोष ढोते-ढोते,इसलिए सच से भीकाम की तरह डरते थे।फिर एक वाक्य आया—कठोर नहीं,पर निर्विवाद:“जैसे ही बंधन स्वीकारे जाते हैं,आप वही नहीं रहते।”कोई समाधान नहीं दिया गया,कोई विधि […]

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पत्ता, पेट और पृथ्वी

पत्ता, पेट और पृथ्वी / मनीभाई नवरत्न

समाज और यथार्थ

पत्ता, पेट और पृथ्वी हम खड़े हैं एक ऐसे समय मेंजहाँ सवालरोटी बनाम रोज़गार का नहीं,रोटी बनाम भविष्य का है।तेंदूपत्ता अब केवल पत्ता नहीं रहा—वह नीति है, मजबूरी है,हमारी सामूहिक चुप्पी काहरा दस्तावेज़ है। मनुष्य कहता है—मेरे बच्चे हैं,मेरी भूख है,विकल्प नहीं मेरे पास ।जबकिविकल्प हमेशा होता है,बस हम टालते रहते हैं उसे।जो जलती है

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बोध और अवबोध

हिंदी कविता

बोध और अवबोध बोध और अवबोधजान लेना हीदेख लेना नहीं होता।सूचनायेंआँख नहीं खोलती,केवल स्मृति भरती है।यही भ्रमजीवन भर चलता रहता है। तथ्य बताए गए,पर भीतर कुछ नहीं हिला।कहा गया—यह ठीक है,यह गलत है।दिमाग नेसहमति दे दी,जीवन वैसा ही रहाजस का तस। आग का वर्णनहाथ नहीं जलाता।जब तक तापस्वयं को न छुए,सावधानीकेवल एक विचार तक रहती

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सुविधा के विरुद्ध सत्य

हिंदी कविता

सुविधा के विरुद्ध सत्य मैंने देखा—लोग सच नहीं ढूँढते,वे अपनी सुविधा ढूँढते हैं। भीड़ के कंधों पर चढ़करहर कोई ऊँचा दिखना चाहता है,पर अपने भीतर उतरने सेसब डरते हैं। हम शोर को संवाद कहते हैं,सूचनाओं को समझ,और आदतों को जीवन। जो बिना प्रश्न चले,वही स्वीकार्य हो जाता है;जो ठहरकर देखे—वह असुविधाजनक ठहरता है। स्वतंत्रताकोई उपहार

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वही डूबना तैरना है / मनीभाई नवरत्न

हिंदी कविता

वही डूबना तैरना है जो सच में सार्थक है,उसमें जब तुम डूबते हो,तो फालतू बातेंदरवाज़े पर आकर भीअंदर नहीं आ पातीं। वे दस्तक देती हैं,पर भीतर कोई खाली नहीं मिलता—मन किसी सच्ची उपस्थिति सेभरा हुआ होता है। पर सावधान।हर डूबना मुक्ति नहीं होता। कुछ डूबनाबेहोशी की तरह होता है—जहाँ चिंता इसलिए नहीं मिटतीकि हल मिल

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छोटे क्यों बने रहना?

हिंदी कविता

छोटे क्यों बने रहना? छोटा जन्म लेनाकोई अपराध नहीं है। अज्ञान, असुरक्षा, प्रतिक्रिया—यहीं से हर जीवन शुरू होता है। पर छोटा बने रहनाएक चुनाव है। महानकोई जन्म से महान नहीं होता। वह बस एक दिनइतना कह देता है—अब और नहीं। अब इस छोटेपन सेसमझौता नहीं। वह सुविधा के बजायज़िम्मेदारी चुनता है।भ्रम के बजायस्पष्टता।भटकाव के बजायगहराई।

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लक्ष्य / मनीभाई नवरत्न

हिंदी कविता

ऐसा लक्ष्य चुनो, जहाँ पहुँचा ही न जा सके ऐसा लक्ष्य मत चुनो कि जो पूरा हो जाए।बल्कि ऐसा लक्ष्य चुनोजो हमें आख़िरी साँस तकचलाए रखे।क्योंकि जिस दिनहम कहते हैं कि —मैं पहुँच गया अपने लक्ष्य तक —उसी दिनपतन शुरू हो जाता है। पूर्णता का भ्रमसबसे बड़ा विश्राम है।और विश्रामअहंकार का प्रिय आसन।इसलिए उद्देश्यइतना ऊँचा

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चुनाव / मनीभाई नवरत्न

हिंदी कविता

चुनाव सारी असहायताऔर दोषारोपणएक अभिनय है।सबसे कमज़ोर क्षण में भीहम इतने सक्षम होते हैंकि चुनाव कर सकें।और यही वह शक्ति हैजो हमें दिल के सबसे पासरखना चाहिए। कोई भी स्थितिइतनी अँधेरी नहीं होती किसही चुनाव से हमेंछूट मिल जाए।और कोई भी स्थितिइतनी उजली नहीं होती किसही चुनावअनावश्यक हो जाए। सुख हो या दुःख,स्पष्टता हो या

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jeb aur jism

“जेब और जिस्म की शादी”

समाज और यथार्थ

“जेब और जिस्म की शादी” शादी—एक ऐसा शब्दजिसके भीतर प्रेम से ज़्यादाभ्रम रहता है।हम सोचते हैंहम किसी व्यक्ति को चुन रहे हैं—पर सच मेंहम उसके भीतर नहीं देखते,सिर्फ़ उसकी सतह को नापते हैं। लड़की की दृष्टिलड़के की जेब में उतरती है—वह भविष्य नहीं ढूँढती,भविष्य की गारंटी ढूँढती है।जैसे मनुष्य नहीं,एक बीमा पॉलिसी चुन रही होजिस

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भारत छोडो आन्दोलन

सवाल ही पहली क्रांति / मनीभाई नवरत्न

हिंदी कविता

सवाल ही पहली क्रांति हुकूमत करने वालेसिर्फ़ दो-चार,कुर्सी पर बैठे,कलम और बंदूक के सहारेअपने को विशाल समझते हैं।मानने वालेहज़ारों नहीं,लाखों में—फिर भी सिर झुकाए,नज़रें ज़मीन पर टिकी हुई। डर की भाषासबको समझाई जाती है—कभी नौकरी का डर,कभी रोटी का,कभी जेल का,तो कभी बदनामी का।शासन तलवार से नहीं चलता,चलता हैदिलों में भरे गए डर से। दो-चार

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अरावली पर्वत

अरावली, जंगल, बाजार और मैं

हिंदी कविता

अरावली, जंगल, बाजार और मैं अरावलीसिर्फ पहाड़ नहीं है,यह समय की रीढ़ है,जो थामे खड़ी हैरेगिस्तान कीबढ़ती हुई लालसा को। जब अरावली कटती हैतो पत्थर नहीं गिरते,भविष्य दरकता है,पीढ़ियों की प्यासज़मीन के भीतरसूख जाती है। जंगलपेड़ों की गिनती नहीं,धरती के फेफड़े हैं,जहाँ हवासंस्कार लेकर निकलती है,और जीवनसंतुलन सीखता है। एक पेड़ गिरता हैतो एक छाया

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समझ / मनीभाई नवरत्न

मन और भावनाएँ

समझजानकारी नहीं है।जो पढ़ ली जाए,याद कर ली जाए—वह समझ नहीं। समझवह हैजो देखने के बादबदलने को विवश कर दे। जो सच दिखा देऔर फिरपुराना बने रहनाअसंभव कर दे—वही समझ है। समझभावना नहीं है।आँसू आ जाएँ,दिल भर आए—यह संवेदना हो सकती है,समझ नहीं। समझतब होती हैजब आँसू नहीं,भ्रम गिरते हैं। जबदोष देना छूटता है,शिकायत थमती

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