कविता बहार

"कविता बहार" हिंदी कविता का लिखित संग्रह [ Collection of Hindi poems] है। जिसे भावी पीढ़ियों के लिए अमूल्य निधि के रूप में संजोया जा रहा है। कवियों के नाम, प्रतिष्ठा बनाये रखने के लिए कविता बहार प्रतिबद्ध है।

बाल श्रम निषेध दिवस

जीवन के झंझावातों में श्रमिक बन जाते है

हिंदी कविता,

जीवन के झंझावातों में श्रमिक बन जाते है नन्ही नन्ही कोमल कायानिज स्वेद बहाते हैं।जीवन के झंझावातों में,श्रमिक  बन जाते है।हाथ खिलौने वाले  देखो,ईंटों को झेल रहे।नसीब नहीं किताबें इनकोमिट्टी से खेल रहेकठिन मेहनत करते है तबदो रोटी पाते है।जीवन के—–गरीबी अशिक्षा के चलते,जीवन दूभर होतातपा ईंट भठ्ठे में जीवनबचपन कुंदन होतासपने सारे दृग जल

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hands mother and her kids

राह निहारूं माई- सन्त राम सलाम

हिंदी कविता

यहाँ मान पर हिंदी कविता लिखी गयी है .माँ वह है जो हमें जन्म देने के साथ ही हमारा लालन-पालन भी करती हैं। माँ के इस रिश्तें को दुनियां में सबसे ज्यादा सम्मान दिया जाता है। राह निहारूं माई – सन्त राम सलाम सांझ सबेरे तेरी,,,,,,,,राह निहारूं माई,,,,,,,,,मुझे छोड़-छोड़ मां तू, कहां चली जाती है।

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जवाहरलाल नेहरू

जन-जन करोड़ों की मधुर मुसकान चाचा नेहरू /सुनील श्रीवास्तव ‘श्री’

समाज और यथार्थ,

भारत के पहले प्रधान मंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को बच्चे प्यार से ‘चाचा नेहरू’ भी कहते हैं। जवाहरलाल नेहरू का मानना ​​था कि बच्चे किसी भी समाज की मूल नींव होते हैं, इसलिए उनका पालन-पोषण उपयुक्त वातावरण में किया जाना चाहिए और पंडित जवाहरलाल नेहरू की जयंती के उपलक्ष्य में हर साल 14 नवंबर को बाल

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बाल श्रम निषेध दिवस

बाल मजदूरी निषेध पर कविताएँ

समाज और यथार्थ,

बाल मजदूरी निषेध पर कविताएँ: बाल-श्रम का मतलब यह है कि जिसमे कार्य करने वाला व्यक्ति कानून द्वारा निर्धारित आयु सीमा से छोटा होता है।

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बाल श्रम निषेध दिवस

बाल मजदूर पर कविता (लावणी छंद मुक्तक)

समाज और यथार्थ, , ,

हर साल 12 जून को विश्व दिवस बाल श्रमिकों की दुर्दशा को उजागर करने और उनकी मदद के लिए किया जा सकता है, इसके लिए सरकारों, नियोक्ताओं और श्रमिक संगठनों, नागरिक समाज के साथ-साथ दुनिया भर के लाखों लोगों को एक साथ लाता है। बाल मजदूर पर कविता (लावणी छंद मुक्तक) राज, समाज, परायों अपनों, के

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chandani raat

आँख खुलने लगी / नीलम

प्रकृति और पर्यावरण

आँख खुलने लगी/ नीलम आँख खुलने लगी/ नीलम रात के पिछले पहर मेंशीत की ठंडी लहर मेंकोहरे की चादर ओढ़ेसो रहे थे चाँद-तारे धीरे -धीरे धरा सरकतीजा पहुँची प्राची के द्वारेथरथराती ठंड से सिकुड़तीथपथपा खुलवा रही थी द्वार उषा ने धीमें से झांका झिरी सेफिर हौले से खोले द्वारपहचान पृथा को थोड़ा साकिया स्वागत उजास

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help to each other

मानवता के दीप /भुवन बिष्ट

हिंदी कविता

मानवता के दीप/ भुवन बिष्ट मानवता के दीप/ भुवन बिष्ट हम तो सदा ही मानवता के दीप जलाते हैं,उदास चेहरों पर सदा मुस्कराहट लाते हैं। हार मानकर  बैठते जो कठिन राहों को देख,हौंसला बढ़ाकर उनको भी चलना सिखाते हैं। कर देते पग डगमग कभी उलझनें देखकर,मन में साहस लेकर हम फिर भी मुस्कराते हैं। मिल जाये

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chandani raat

चांदनी रात / क्रान्ति

हिंदी कविता

चांदनी रात / क्रान्ति द्वारा रचित चांदनी रात / क्रान्ति चांदनी रात मेंपिया की याद सताएमिलने की चाहदिल में दर्द जगाए।। हवा की तेज लहरजिगर में घोले जहरकैसे बताऊं मैं तुम्हेंसोई नहीं मैं रातभर।। दिल के झरोखे मेंदस्तक देती हवाएंदेखकर हंसे मुझपरदिल के पीर बढ़ाए।। दिल पर रख के पत्थरदर्द अपना छुपाया हैकैसे बताऊं तुझको

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क्षितिज सूर्य

धूप की ओट में बैठा क्षितिज / निमाई प्रधान’क्षितिज’

हिंदी कविता

धूप की ओट में बैठा क्षितिज /निमाई प्रधान’क्षितिज’ रवि-रश्मियाँ-रजत-धवल पसरीं वर्षान्त की दुपहरी मैना की चिंचिंयाँ-चिंयाँ से शहर न लगता था शहरी वहीं महाविद्यालय-प्रांगण में प्राध्यापकों की बसी सभा थी किंतु परे ‘वह’ एक-अकेला छांव पकड़ना सीख रहा था ! धूप की ओट में बैठा ‘क्षितिज’ ख़ुद के भीतर जाना सीख रहा था !! मधु-गीत

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dev danav mohini

दैव व दानवों की वृत्तियां /पुष्पा शर्मा “कुसुम”

हिंदी कविता

दैव व दानवों की वृत्तियां /पुष्पा शर्मा “कुसुम”द्वारा रचित दैव व दानवों की वृत्तियां/ पुष्पा शर्मा “कुसुम” कंटक चुभकर पैरों मेंअवरोधक बन जाते हैं,किन्तु सुमन तो सदैव हीनिज सौरभ फैलाते हैं। बढा सौरभ लाँघ कंटकवन उपवन और वादियाँ,हो गया विस्तार छोड़करक्षेत्र धर्म और जातियाँ। धरा के अस्तित्व से चलीदैव व दानवों की वृत्तियां,ज्ञान का ले

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virah viyog bewafa sad women

कहां गए हो छोड़कर आती हर पल याद / पीयूष कुमार द्विवेदी ‘पूतू’

हिंदी कविता

कहां गए हो छोड़कर आती हर पल याद / पीयूष कुमार द्विवेदी ‘पूतू’ द्वारा रचित कहां गए हो छोड़कर आती हर पल याद/ पीयूष कुमार द्विवेदी ‘पूतू’ कहाँ गए हो छोड़कर,आती हर पल याद।घर का हर कोना हुआ,यादों से आबाद। चीख रहा है बैठका,रोती चौकी रिक्त।टिकी छड़ी दीवार से,देख नैन हों सिक्त।बेल वेदना उर बढ़े,मिले विरह की

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