कविता बहार

"कविता बहार" हिंदी कविता का लिखित संग्रह [ Collection of Hindi poems] है। जिसे भावी पीढ़ियों के लिए अमूल्य निधि के रूप में संजोया जा रहा है। कवियों के नाम, प्रतिष्ठा बनाये रखने के लिए कविता बहार प्रतिबद्ध है।

वर्षा ऋतु कविता – कवयित्री श्रीमती शशिकला कठोलिया

प्रकृति और पर्यावरण

वर्षा ऋतु कविता  ग्रीष्म ऋतु की प्रचंड तपिश, प्यासी धरती पर वर्षा की फुहार,       चारों ओर फैली सोंधी मिट्टी,प्रकृति में होने लगा जीवन संचार। दिख रहा नीला आसमान ,सघन घटाओं से आच्छादित ,वर्षा से धरती की हो रही ,श्यामल सौंदर्य द्विगुणित ।  छाई हुई है खेतों में ,सर्वत्र हरियाली ही हरियाली ,नाच रहे हैं […]

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संयुक्त राष्ट्र दिवस पर कविता-अरुणा डोगरा शर्मा

हिंदी कविता

संयुक्त राष्ट्र दिवस पर कविता मैं पृथ्वी,सुनाती हूं अपनी जुबानी साफ जल, थल, वायु से,साफ था मेरा जीवमंडल।मानव ने किया तिरस्कार,बर्बरता से तोड़ा मेरा कमंडल।दूषित किया जल, थल, वायु को की अपनी मनमानी ।मैं पृथ्वी,सुनाती हूं अपनी जुबानी। उत्सर्जन जहरीली गैसों का, औद्योगिकरण का गंदा पानी, वन नाशन,अपकर्ष धरा का निरंतर बढा़ता चला गया।ऋषियो, मुनियों ने माना था,मुझे कुदरत का

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संयुक्त राष्ट्र संघ का सपना -बृजमोहन श्रीवास्तव “साथी”

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संयुक्त राष्ट्र संघ का सपना संयुक्त राष्ट्र संघ का सपना ,                मानव श्रेष्ठ बनाना है ।शोषण कोई नही कर पाये ,         जन जन को बतलाना है ।। भूख गरीबी लाचारी में ,            जो जन जीवन जीता है ।सच मानो वो

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सुंदर विश्व बनाएं-डॉ नीलम

हिंदी कविता

सुंदर विश्व बनाएं मानव के हाथों में कुदालखोद रहा अपने पैरों से रहा अपनी जडे़ निकाल अपने अपने झगडे़ लेकरकरता नरसंहार हैविश्व शांति के लिए बसबना संयुक्त राष्ट्र है निःशस्त्रिकरण की ओट मेंअपने घर में आयुध भंडार भरेपरमाणु की धौंस जता करकमजोरों पर वार करें कितनी कितनी शाखाएँ खोलींपर विश्व ना सुखी हुआएक देश कुपोषित होतादूजा महामारी

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शांति पर कविता -नरेन्द्र कुमार कुलमित्र

हास्य और व्यंग्य, हिंदी कविता

शांति पर कविता  हम कैसे लोग हैंकहते हैं—हमें ये नहीं करना चाहिएऔर वही करते हैंवही करने के लिए सोचते हैंआने वाली हमारी पीढियां भीवही करने के लिए ख़्वाहिशमंद रहती हैजैसे नशाजैसे झूठजैसे अश्लील विचार और सेक्सजैसे ईर्ष्या-द्वेषजैसे युद्ध और हत्याएंऐसे ही और कई-कई वर्जनाओं की चाह हम नकार की संस्कृति में पैदा हुए हैंहमें नकार सीखाया

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संयुक्त राष्ट्र पर कविता- दूजराम साहू

विज्ञान, तकनीक और भविष्य

संयुक्त राष्ट्र पर कविता आसमान छूने की है तमन्ना, अंधाधुंध हो रहे अविष्कार! चूक गए तो विनाशकारीसफलता में जीवन उजियार! !  विज्ञान वरदान ही नहीं, अभिशाप भी है, कहीं नेकी करता तो कहीं पाप भी है! उन्नति में लग जाए तोकर दे भव से पार ! चूक गए तो विनाशकारीसफलता में जीवन उजियार ! !  निर्माण के इस पावन युग

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घर वापसी- राजेश पाण्डेय वत्स

हिंदी कविता

घर वापसी नित नित शाम को, सूरज पश्चिम जाता है। श्रम पथ का जातक फिर अपने घर आता है।  भूल जाते हैं बातें थकान और तनाव की ,अपने को जब जबपरिवार के बीच पाता है।  पंछियों की तरह चहकतेघर का हर सदस्य,घर का छत भी तब अम्बर नजर आता है।  कल्प-वृक्ष की ठंडकता भी फीकी सी लगने लगे शीतल पानी का गिलासजब

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वक़्त से मैंने पूछा-नरेन्द्र कुमार कुलमित्र

हिंदी कविता

वक़्त से मैंने पूछा      वक़्त से मैंने पूछाक्या थोड़ी देर तुम रुकोगे ?वक़्त ने मुस्करायाऔरप्रतिप्रश्न करते हुएक्या तुम मेरे साथ चलोगे?आगे बढ़ गया…। वक़्त रुकने के लिए विवश नहीं थाचलना उसकी आदत में रहा है सो वह चला गयातमाम विवशताओं से घिरा मैं चुपचाप बैठा रहावक्त के साथ नहीं चलापरवक्त के जाने के बादउसे हर पल

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दिखा दे अपनी मानवता- शशिकला कठोलिया

हिंदी कविता

दिखा दे अपनी मानवता लेकर कोई नहीं आया ,जीवन की अमरता ,क्षणभंगुर संसार में ,दिखा दे अपनी मानवता । देशकाल जाति पाति की ,दीवारों को तोड़कर ,छुआछूत ऊंच नीच की ,सबी विविधता को हर ,हर इंसान के मन से ,मिता दे विविधता, क्षणभंगुर संसार में ,दिखा दे अपने मानवता । हंसना है तो ऐसे हंसो,हंसे तुम्हारे

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मैं हूं एक लेखनी-शशिकला कठोलिया

विज्ञान, तकनीक और भविष्य

मैं हूं एक लेखनी मैं हूं एक लेखनी ,क्यों मुझे नहीं जानता ,निरादर किया जिसने ,जग में नहीं महानता।जिसने मुझे अपनाया ,हुआ वह बड़ा विद्वान ,जिसने किया आदर ,मिला यश और सम्मान ,मेरे ही द्वारा हुआ ,रचना महाभारत रामायण ,साहित्यो का हुआ विमोचन ,ज्ञान विज्ञान का लेखन ,देश में हुए वृहद कार्य, मेरे ही भरोसे बल

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वर्षा ऋतु पर कविता -हरीश पटेल

प्रकृति और पर्यावरण

वर्षा ऋतु पर कविता आज धरा भी तप्त हुई है।हृदय से शोले निकल पड़े हैं।।कण-कण अब करे पुकार ।आ जाओ वर्षा एक बार।। प्यास अब उमड़ चुकी है ।जिंदगी को बेतरतीब कर विक्षिप्त पड़ा है।।तुम पहली बूंद बन कर आ जाना ।तुम वर्षा हो आकर बरस जाना ।।निर्जीव सदृश यह काया है, रूह बनकर समा

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मन करता है कुछ लिखने को-अमित कुमार दवे

हिंदी कविता

मन करता है कुछ लिखने को जब भी सत्य के समीप होता हूँ, असत्य को व्याप्त देखता हूँ ,शब्द जिह्वा पर ही रुक जाते हैं, मन करता है…..कुछ लिखने को ।। वाणी से गरिमा गिरने लगती है, लज्जा पलकों से हटने लगती है ,विकारी दृष्टि लगने लगती है, तब..मन करता है…..कुछ लिखने को ।। अंधानुकरण को स्वतःअपनाती,नई पीढ़ी

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