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सरसी छंद विधान – होलिका आई

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सरसी छंद विधान – होलिका आई

चैत्र कृष्ण एकम होली धुलेंड़ी वसंतोत्सव Chaitra Krishna Ekam Holi Dhulendi Vasantotsav

सरसी छंद विधान: —
१६ + ११ मात्रा ,पदांत २१(गाल)
चौपाई+दोहा का सम चरण


हम भी छेडें राग
बीत बसंत होलिका आई,
अब तो आजा मीत।
फाग रमेंगें रंग बिखरेंगे,
मिल गायेंगे गीत।

खेत फसल सब हुए सुनहरी,
कोयल गाये फाग।
भँवरे तितली मन भटकाएँ,
हम भी छेड़ें राग।

घर आजा अब प्रिय परदेशी,
मैं करती फरियाद।
लिख लिख भेज रही मैं पाती,
रैन दिवस करि याद।

याद मचलती पछुआ चलती,
नही सुहाए धूप।
बैरिन कोयल कुहुक दिलाती।
याद तेरे मन रूप।

सजन लौट के प्रिय घर आजा,
तन मन चाहत मेल।
जलता बदन होलिका जैसे,
चाह रंग रस खेल।

मदन फाग संग बहुत सताए,
तन अमराई बौर।
चंचल चपल गात मन भरमें,
सुन कोयल का शोर।

निंदिया रानी रूठ रही है,
रैन दिवस के बैर।
रंग बहाने से हुलियारे,
खूब चिढ़ाते गैर।

लौट पिया जल्दी घर आना।
तुमको मेरी आन।
नहि,आए तो समझो सजना,
नहीं बचें मम प्रान।
. ———
बाबू लाल शर्मा “बौहरा” विज्ञ

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